मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 728, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 728
७१८ * मत्स्यपुराण *
| तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्।<br>जगत्संत्रासजननं युगसंवर्तकोपमम्॥ ६<br><br>हस्तमुक्तैश्च परिघैर्विप्रयुक्तैश्च पर्वतैः।<br>दानवाः समरे जघ्नुर्देवानिन्द्रपुरोगमान्॥ ७<br><br>ते वध्यमाना बलिभिर्दानवैर्जयकाङ्क्षिभिः।<br>विषण्णवदना देवा जग्मुरार्तिं परां मृधे॥ ८<br><br>तैस्त्रिशूलप्रमथिताः परिघैर्भिन्नमस्तकाः।<br>भिन्नोरस्का दितिसुतैर्वमू रक्तं व्रणैर्बहु॥ ९<br><br>वेष्टिताः शरजालैश्च निर्यत्नाश्चासुरैः कृताः।<br>प्रविष्टा दानवीं मायां न शेकुस्ते विचेष्टितुम्॥ १०<br><br>अस्तंगतमिवाभाति निष्प्राणसदृशाकृतिः।<br>बलं सुराणामसुरैर्निष्प्रयत्नायुधं कृतम्॥ ११<br><br>दैत्यचापच्युतान् घोरंश्छित्त्वा वज्रेण ताञ्शरान्।<br>शक्रो दैत्यबलं घोरं विवेश बहुलोचनः॥ १२<br><br>स दैत्यप्रमुखान् हत्वा तद्दानवबलं महत्।<br>तामसेनास्त्रजालेन तमोभूतमथाकरोत्॥ १३<br><br>तेऽन्योऽन्यं नावबुध्यन्त देवानां वाहनानि च।<br>घोरेण तमसाविष्टाः पुरुहूतस्य तेजसा॥ १४<br><br>मायापाशैर्विमुक्तास्तु यत्नवन्तः सुरोत्तमाः।<br>वपूंषि दैत्यसिंहानां तमोभूतान्यपातयन्॥ १५<br><br>अपध्वस्ता विसंज्ञाश्च तमसा नीलवर्चसा।<br>पेतुस्ते दानवगणाश्छिन्नपक्षा इवाद्रयः॥ १६<br><br>तद् घनीभूतदैत्येन्द्रमन्धकार इवार्णवे।<br>दानवं देवकदनं तमोभूतमिवाभवत्॥ १७<br><br>तदा सृजन् महामायां मयस्तां तामसीं दहन्।<br>युगान्तोद्योतजननीं सृष्टामौर्वेण वह्निना॥ १८<br><br>सा ददाह ततः सर्वान् मायाः मयविकल्पिताः।<br>दैत्याश्चादित्यवपुषः सद्य उत्तस्थुराहवे॥ १९ | गिराये जा रहे थे, इस प्रकार देवों और दानवोंसे व्याप्त हुए उस युद्धने भयंकर रूप धारण कर लिया है। वह युगान्तकालिक संवर्तक अग्निकी तरह जगत्को भयभीत करने लगा। दानवगण समरभूमिमें पृथक्-पृथक् हाथोंसे फेंके गये परिघों और पर्वतोंसे इन्द्र आदि देवताओंपर प्रहार करने लगे। इस प्रकार रणभूमिमें विजयाभिलाषी बलवान् दानवोंद्वारा मारे जाते हुए उन देवताओंका मुख सूख गया और वे बड़ी कष्टपूर्ण स्थितिमें पड़ गये। दानवोंने उन्हें शूलोंसे बींध डाला, परिघोंकी चोटसे उनके मस्तक विदीर्ण तथा वक्षःस्थल चूर-चूर हो गये और उनके घावोंसे अविरल रक्त प्रवाहित होने लगा। असुरोंने देवताओंको बाणसमूहोंसे परिवेष्टित करके प्रयत्नहीन कर दिया। वे दानवी मायामें प्रविष्ट होकर किसी प्रकारकी भी चेष्टा करनेमें असमर्थ हो गये। देवताओंकी वह सेना प्राणरहितकी तरह विनष्ट हुई-सी दीख रही थी। असुरोंने उसे आयुध और प्रयत्नसे रहित कर दिया था॥ १-११॥<br><br>तदनन्तर सहस्रनेत्रधारी इन्द्र वज्रद्वारा दैत्योंके धनुषोंसे छूटे हुए भयंकर बाणोंको छिन्न-भिन्न करके दैत्योंकी भीषण सेनामें प्रविष्ट हुए। उन्होंने प्रधान-प्रधान दैत्योंका वध करके दानवोंकी उस विशाल सेनाको तामस अस्त्रसमूहके प्रयोगसे अन्धकारमय बना दिया। इस प्रकार इन्द्रके पराक्रमसे घोर अन्धकारसे घिरे हुए वे दानव परस्पर एक-दूसरेको तथा देवताओंके वाहनोंको भी नहीं पहचान पाते थे। इधर दानवी मायाके पाशसे मुक्त हुए श्रेष्ठ देवगण प्रयत्न करके दैत्येन्द्रोंके अन्धकारमय शरीरोंको काटकर गिराने लगे। उस नील कान्तिवाले अन्धकारसे घिरे हुए वे दानवगण मूच्छित होकर धराशायी होते हुए ऐसे लग रहे थे मानो कटे हुए पंखवाले पर्वत हों। दैत्येन्द्रोंकी वह सेना समुद्रमें अन्धकारकी तरह एकत्र हो गयी और देवताओंद्वारा मारे जाते हुए दानव अन्धकारमय-से हो गये। यह देखकर मयदानवने इन्द्रकी उस तामसी मायाको नष्ट करते हुए अपनी महान् राक्षसी मायाका सृजन किया। वह और्व नामक अग्निसे उत्पन्न हुई और प्रलयकालीन (भयंकर) प्रकाशको प्रकट कर रही थी। मयद्वारा रची गयी उस मायाने सम्पूर्ण देवताओंको जलाना आरम्भ किया। इधर सूर्यके समान तेजस्वी शरीरवाले दैत्यगण युद्धस्थलमें तुरंत उठ खड़े |