भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 731
* अध्याय १७५ *७२१
संस्कृतहिन्दी
ऊर्वस्योरुं विनिर्भिद्य और्वो नामान्तकोऽनलः।<br>दिधक्षन्निव लोकांस्त्रीञ्जज्ञे परमकोपनः॥ ५०<br>उत्पन्नमात्रश्चोवाच पितरं क्षीणया गिरा।<br>क्षुधा मे बाधते तात जगद् भक्ष्ये त्यजस्व माम्॥ ५१<br>त्रिदिवारोहिभिर्ज्वालैर्जृम्भमाणो दिशो दश।<br>निर्दहन् सर्वभूतानि ववृधे सोऽन्तकोऽनलः॥ ५२<br>एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा मुनिमूर्वं समाजयन्।<br>उवाच वार्यतां पुत्रो जगतश्च दयां कुरु॥ ५३<br>अस्यापत्यस्य ते विप्र करिष्ये स्थानमुत्तमम्।<br>तथ्यमेतद्वचः पुत्र शृणु त्वं वदतां वर॥ ५४इस प्रकार ऊर्वकी जाँघका भेदन कर वह और्व नामक विनाशकारी अग्नि उत्पन्न हुआ, जो परम क्रोधी और तीनों लोकोंको जला डालना चाहता था। उत्पन्न होते ही उसने मन्द स्वरमें पितासे कहा—'तात! मुझे भूख कष्ट दे रही है, अतः मुझे छोड़िये। मैं जगत्‌को खा जाऊँगा।' ऐसा कहकर वह विनाशकारी और्व अग्नि स्वर्गतक पहुँचनेवाली ज्वालाओंसे युक्त हो दसों दिशाओंमें फैलकर समस्त प्राणियोंको भस्म करते हुए बढ़ने लगा। इसी बीच ब्रह्मा ऊर्व मुनिके निकट आये और उन्हें आदर देते हुए बोले—'विप्रवर! तुम मेरी बात तो सुनो। अपने पुत्रको मना कर दो, जगत्‌पर दया तो करो। मैं तुम्हारे इस पुत्रको उत्तम स्थान प्रदान करूँगा। वक्ताओंमें श्रेष्ठ पुत्र! मेरी यह बात एकदम सच है'॥ ४१—५४॥
ऊर्व उवाच<br>धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मेऽद्य भगवाञ्शिशोः।<br>मतिमेतां ददातीह परमानुग्रहाय वै॥ ५५<br>प्रभातकाले सम्प्राप्ते काङ्क्षितव्ये समागमे।<br>भगवंस्तर्पितः पुत्रः कैर्हव्यैः प्राप्स्यते सुखम्॥ ५६<br>कुत्र चास्य निवासः स्याद् भोजनं वा किमात्मकम्।<br>विधास्यतीह भगवान् वीर्यतुल्यं महौजसः॥ ५७ऊर्व बोले— भगवन्! आज मैं धन्य हो गया। आपने मुझपर महान् अनुग्रह किया, जो मेरे पुत्रके लिये इस प्रकारकी बुद्धि दे रहे हैं। यह आपका मुझपर परम अनुग्रह है। किंतु प्रातःकाल होनेपर जब वह पुत्र मेरे पास आयेगा तब मैं उसे किन पदार्थोंसे तृप्त करूँगा, जिससे उसे सुख प्राप्त हो सकेगा? इसका निवासस्थान कहाँ होगा? और इसका भोजन किस प्रकारका होगा? (मुझे आशा है कि) आप इस महान् तेजस्वीके पराक्रमके अनुरूप ही सब विधान करेंगे॥ ५५—५७॥
ब्रह्मोवाच<br>वडवामुखेऽस्य वसतिः समुद्रे वै भविष्यति।<br>मम योनिर्जलं विप्र तस्य पीतवतः सुखम्॥ ५८<br>यत्राहमास नियतं पिबन् वारिमयं हविः।<br>तद्धविस्तव पुत्रस्य विसृजाम्यालयं च तत्॥ ५९<br>ततो युगान्ते भूतानामेष चाहं च पुत्रक।<br>सहितौ विचरिष्यावो निष्पुत्राणामृणापहः॥ ६०<br>एषोऽग्निरन्तकाले तु सलिलाशी मया कृतः।<br>दहनः सर्वभूतानां सदेवासुररक्षसाम्॥ ६१<br>एवमस्त्विति तं सोऽग्निः संवृतज्वालमण्डलः।<br>प्रविवेशार्णवमुखं प्रक्षिप्य पितरि प्रभाम्॥ ६२<br>प्रतियातस्ततो ब्रह्मा ये च सर्वे महर्षयः।<br>और्वस्याग्नेः प्रभां ज्ञात्वा स्वां स्वां गतिमुपाश्रिताः॥ ६३ब्रह्माने कहा— विप्रवर! समुद्रमें स्थित बड़वाके मुखमें इसका निवास होगा और मेरे उत्पत्तिस्थानभूत जलको यह सुखपूर्वक पान करेगा। जहाँ मैं जलमय हविका पान करता हुआ नियत रूपसे निवास करता हूँ, वही हवि और वही स्थान मैं तुम्हारे पुत्रके लिये भी दे रहा हूँ। पुत्र! तत्पश्चात् युगान्तके समय यह और मैं—दोनों एक साथ होकर पुत्रहीन प्राणियोंको पितृ-ऋणसे मुक्त करते हुए विचरण करेंगे। इस प्रकार मैंने इस अग्निको जलभक्षी तथा अन्तकालमें देवता, असुर और राक्षसोंसहित समस्त प्राणियोंको दग्ध कर देनेवाला बना दिया। यह सुनकर ऊर्वने 'एवमस्तु—ऐसा ही हो' कहकर ब्रह्म-वाणीका अनुमोदन किया। तदुपरान्त ज्वालामण्डलसे घिरा हुआ वह अग्नि अपनी कान्तिको पिता ऊर्वमें निहित कर समुद्रके मुखमें प्रविष्ट हो गया। इसके बाद ब्रह्मा ब्रह्मलोकको चले गये और वहाँ उपस्थित सभी महर्षि और्व अग्निकी प्रभाका महत्त्व जानकर अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ५८—६३॥