मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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७२४ * मत्स्यपुराण *
| एतान् मच्छीतनिर्दग्धान् पश्य त्वं हिमवेष्टितान्।<br>विमायान् विमदांश्चैव दैत्यसिंहान् महाहवे॥ १२<br><br>तेषां हिमकरोत्सृष्टाः सपाशा हिमवृष्टयः।<br>वेष्टयन्ति स्म तान् घोरान् दैत्यान् मेघगणा इव॥ १३<br><br>तौ पाशशीतांशुधरौ वरुणेन्दू महाबलौ।<br>जघ्नतुर्हिमपातैश्च पाशपातैश्च दानवान्॥ १४<br><br>द्वावम्बुनाथौ समरे तौ पाशहिमयोधिनौ।<br>मृधे चेरतुरम्भोभिः क्षुब्धाविव महार्णवौ॥ १५<br><br>ताभ्यामाप्लावितं सैन्यं तद्दानवमदृश्यत।<br>जगत्संवर्तकाम्भोदैः प्रविष्टैरिव संवृतम्॥ १६<br><br>तावुद्यताम्बुनाथौ तु शशाङ्कवरुणावुभौ।<br>शमयामासतुर्मायां देवौ दैत्येन्द्रनिर्मिताम्॥ १७<br><br>शीतांशुजालनिर्दग्धाः पाशैश्च स्पन्दिता रणे।<br>न शेकुश्चलितुं दैत्या विशिरस्का इवाद्रयः॥ १८<br><br>शीतांशुनिहतास्ते तु दैत्यास्तोयहिमार्दिताः।<br>हिमाप्लावितसर्वाङ्गा निरुष्माण इवाग्नयः॥ १९<br><br>तेषां तु दिवि दैत्यानां विपरीतप्रभाणि वै।<br>विमानानि विचित्राणि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च॥ २०<br><br>तान् पाशहस्तग्रथितांश्छादिताञ्शीतरश्मिभिः।<br>मयो ददर्श मायावी दानवान् दिवि दानवः॥ २१<br><br>स शिलाजालविततां खड्गचर्माट्टहासिनीम्।<br>पादपोत्कटकूटाग्रां कन्दराकीर्णकाननाम्॥ २२<br><br>सिंहव्याघ्रगणाकीर्णां नदद्भिर्गजयूथपैः।<br>ईहामृगगणाकीर्णां पवनाघूर्णितद्रुमाम्॥ २३<br><br>निर्मितां स्वेन यत्नेन कूजितां दिवि कामगाम्।<br>प्रथितां पार्वतीं मायामसृजत् स समन्ततः॥ २४<br><br>सासिशब्दैः शिलावर्षैः सम्पतद्द्भिश्च पादपैः।<br>जघान देवसङ्घांश्च दानवांश्चाप्यजीवयत्॥ २५ | आप इस भीषण युद्धमें मेरे द्वारा प्रयुक्त किये गये शीतसे जले हुए, हिमपरिवेष्टित, माया और गर्वसे रहित इन दैत्यसिंहोंको देखिये। फिर तो वरुणके पाशसहित चन्द्रमाद्वारा छोड़ी गयी हिमवृष्टिने उन भयंकर दैत्योंको मेघसमूहकी तरह घेर लिया। वे दोनों महाबली पाशधारी वरुण और शीतांशु चन्द्रमा पाश और हिमके प्रहारसे दानवोंका संहार करने लगे। वे दोनों जलके स्वामी और समरमें पाश एवं हिमके द्वारा युद्ध करनेवाले थे, अतः वे रणभूमिमें जलसे क्षुब्ध हुए दो महासागरकी भाँति विचरण करने लगे। उन दोनोंके द्वारा जलमग्न की गयी हुई दानवोंकी वह सेना उमड़े हुए संवर्तक नामक बादलोंसे आच्छादित जगत्की तरह दीख रही थी। इस प्रकार जलके स्वामी उन दोनों देवता चन्द्रमा और वरुणने दैत्येन्द्रद्वारा निर्मित मायाको शान्त कर दिया। रणभूमिमें शीतल किरणसमूहोंसे जले हुए तथा पाशोंसे जकड़े हुए दैत्यगण शिखररहित पर्वतोंकी तरह चलनेमें भी असमर्थ हो गये। शीतांशुके आघातसे उन दैत्योंके सर्वाङ्ग हिमसे आप्लावित हो गये और वे जलकी ठण्डकसे ठिठुर गये। इस प्रकार वे गरमीरहित अग्निकी तरह दीख रहे थे। आकाशमण्डलमें विचरनेवाले उन दैत्योंके विचित्र विमानोंकी कान्ति विपरीत हो गयी और वे लड़खड़ाकर गिरने-पड़ने लगे॥ ११–२०॥<br><br>इस प्रकार जब मायावी मयदानवने आकाशमें उन दानवोंको वरुणके पाशद्वारा बँधे हुए तथा शीतल किरणोंद्वारा आच्छादित देखा, तब उसने चारों ओर सुप्रसिद्ध पार्वती मायाकी सृष्टि की, जो शिलासमूहसे व्याप्त तथा ढाल-तलवारसे युक्त हो अट्टहास करनेवाली थी, जिसका अग्रभाग घने वृक्षोंसे आच्छादित होनेके कारण भयंकर था, जो कन्दराओंसे व्याप्त काननोंसे युक्त, सिंहों, व्याघ्रों, चिग्घाड़ते हुए गजयूथों और भेड़ियोंसे परिपूर्ण थी, जिसके वृक्ष वायुके झकोरेसे चक्कर काट रहे थे, जो अपने ही प्रयत्नसे निर्मित, घोर शब्द करनेवाली और आकाशमें स्वेच्छानुसार गमन करनेवाली थी। वह पार्वती-माया तलवारोंकी खनखनाहट, शिलाओंकी वृष्टि और गिरते हुए वृक्षोंसे देवसमूहोंका संहार करने लगी। उधर उसने दानवोंको जीवित भी कर दिया। |