मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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७८२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अनौपम्योवाच<br>भगवन् मानुषे लोके केन तुष्यति केशवः।<br>व्रतेन नियमेनाथ दानेन तपसापि वा॥ २६ | अनौपम्या ने पूछा— भगवन्! मनुष्यलोकमें केशव व्रत, नियम, दान अथवा तपस्या—इनमें किससे प्रसन्न होते हैं?॥ २६॥ |
| नारद उवाच<br>तिलधेनुं च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे।<br>ससागरवनद्वीपा दत्ता भवति मेदिनी॥ २७<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सार्वकामिकैः।<br>मोदते चाक्षयं कालं यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥ २८<br>आम्रामलकपित्थानि बदराणि तथैव च।<br>कदम्बचम्पकाशोकपुन्नागविविधद्रुमान् ॥ २९<br>अश्वत्थपिप्पलांश्चैव कदलीवटदाडिमान्।<br>पिचुमन्दं मधूकं च उपोष्य स्त्री ददाति या॥ ३०<br>स्तनौ कपित्थसदृशावूरू च कदलीसभौ।<br>अश्वत्थे वन्दनीया च पिचुमन्दे सुगन्धिनी॥ ३१<br>चम्पके चम्पकाभा स्यादशोके शोकवर्जिता।<br>मधूके मधुरं वक्ति वटे च मृदुगात्रिका॥ ३२<br>बदरी सर्वदा स्त्रीणां महासौभाग्यदायिनी।<br>कुक्कुटी कर्कटी चैव द्रव्यषष्ठी न शस्यते॥ ३३<br>कदम्बमिश्रकनकमञ्जरीपूजनं तथा।<br>अनग्निपक्वमन्नं च पक्वान्नानामभक्षणम्॥ ३४<br>फलानां च परित्यागः संध्यामौनं तथैव च।<br>प्रथमं क्षेत्रपालस्य पूजा कार्या प्रयत्नतः॥ ३५<br>तस्या भवति वै भर्ता मुखप्रेक्षी सदानघे।<br>अष्टमी च चतुर्थी च पञ्चमी द्वादशी तथा॥ ३६<br>संक्रान्तिर्विषुवच्चैव दिनच्छिद्रमुखं तथा।<br>एतांस्तु दिवसान् दिव्यानुपवसन्ति याः स्त्रियः।<br>तासां तु धर्मयुक्तानां स्वर्गवासो न संशयः॥ ३७<br>कलिकालुष्यनिर्मुक्ताः सर्वपापविवर्जिताः।<br>उपवासरतां नारीं नोपसर्पति तां यमः॥ ३८ | नारदजीने कहा— जो मनुष्य वेदमें पारङ्गत ब्राह्मणको तिलधेनुका दान करता है, उसके द्वारा समुद्र, वन और द्वीपोंसहित पृथ्वीका दान सम्पन्न हुआ समझना चाहिये। वह दाता करोड़ों सूर्योंके समान देदीप्यमान एवं सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंद्वारा सूर्य, चन्द्र और तारोंकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्द मनाता है। जो स्त्री उपवास करके आम, आँवला, कैथ, बेर, कदम्ब, चम्पक, अशोक, पुंनाग, जायफल, पीपल, केला, वट, अनार, नीम, महुआ आदि अनेक प्रकारके वृक्षोंका दान करती है, उसके दोनों स्तन कैथके समान और दोनों जंघाएँ केलेके सदृश सुन्दर होती हैं। वह अश्वत्थके दानसे वन्दनीय और नीमके दानसे सुगन्धयुक्त होती है। वह चम्पाके दानसे चम्पाकी-सी कान्तिवाली और अशोकके दानसे शोकरहित होती है। महुआके दानसे वह मधुरभाषिणी होती है और वटके दानसे उसका शरीर कोमल होता है। बेर स्त्रियोंके लिये सदा महान् सौभाग्यदायी होता है। ककड़ी, जटाधारी और द्रव्यषष्ठीका दान, कदम्बसे मिश्रित धतूरेकी मंजरीसे पूजन, बिना अग्निसे पकाया हुआ अन्न एवं पके हुए अन्नोंका अभक्षण, फलोंका परित्याग तथा संध्याकालमें मौनधारण—ये स्त्रियोंके लिये प्रशस्त नहीं हैं। सर्वप्रथम प्रयत्नपूर्वक क्षेत्रपालकी पूजा करनी चाहिये। पापशून्ये! उस स्त्रीका पति सदा उसका मुख ही देखा करता है। जो स्त्रियाँ अष्टमी, चतुर्थी, पञ्चमी और द्वादशी तिथि, संक्रान्ति, विषुवयोग और दिनच्छिद्रमुख (दोपहरमें चन्द्रमाका नये मासकी तिथिमें प्रवेश करना)—इन दिव्य दिनोंमें उपवास करती हैं, उस धर्मयुक्त स्त्रियोंका स्वर्गमें निवास होता है—इसमें संदेह नहीं है। वे कलियुगके पापोंसे रहित और सभी पापोंसे शून्य हो जाती हैं। इस प्रकार जो स्त्री उपवासमें तत्पर रहती है, उसके समीप यम भी नहीं आते॥२७—३८॥ |
| अनौपम्योवाच<br>अस्मिन् कृतेन पुण्येन पुराजन्मकृतेन वा।<br>भवदागमनं भूतं किंचित् पृच्छाम्यहं व्रतम्॥ ३९ | अनौपम्या बोली— नारदजी! पता नहीं, इस जन्ममें या पूर्व जन्ममें किये हुए पुण्यसे ही आपका यहाँ आगमन हुआ है। अब मैं आपसे कतिपय व्रतोंके विषयमें पूछती |