भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७८६ * मत्स्यपुराण *


| निर्दयो व्यदहद् वह्निर्हरक्रोधेन प्रेरितः।<br>सहस्रशः प्रबुद्धाश्च सुप्ताश्च बहवो जनाः॥ ३०<br>पुत्रमालिङ्ग्य ते गाढं दह्यन्ते त्रिपुराग्निना।<br>निदाघोऽभून्महावह्नेरन्तकालो यथा तथा॥ ३१<br>केचिद् गुप्ताः प्रदग्धास्तु भार्योत्सङ्गगतास्तथा।<br>पित्रा मात्रा च सुश्लिष्टा दग्धास्वे त्रिपुराग्निना ॥ ३२<br>अथ तस्मिन् पुरे दीप्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः ॥ ३३<br>अग्निज्वालाहतास्तत्र ह्यपतन् धरणीतले।<br>काचिच्छ्यामा विशालाक्षी मुक्तावलिविभूषिता ॥ ३४<br>धूमेनाकुलिता सा तु पतिता धरणीतले।<br>काचित् कनकवर्णाभा इन्द्रनीलविभूषिता ॥ ३५<br>भर्तारं पतितं दृष्ट्वा पतिता तस्य चोपरि।<br>काचिदादित्यसङ्काशा प्रसुप्ता च गृहे स्थिता ॥ ३६<br>अग्निज्वालाहता सा तु पतिता गतचेतना।<br>उत्थितो दानवस्तत्र खड्गहस्तो महाबलः ॥ ३७<br>वैश्वानरहतः सोऽपि पतितो धरणीतले।<br>मेघवर्णापरा नारी हारकेयूरभूषिता ॥ ३८<br>श्वेतवस्त्रपरीधाना बालं स्तन्यं न्यधापयत्।<br>दह्यन्तं बालकं दृष्ट्वा रुदती मेघशब्दवत्॥ ३९<br>एवं स तु दहन्नग्निर्हरक्रोधेन प्रेरितः।<br>काचिच्चन्द्रप्रभा सौम्या वज्रवैदूर्यभूषिता ॥ ४० | और घोड़ोंमें फैलकर निर्दयतापूर्वक जला रहे थे। हजारों जागे हुए एवं अनेकों सोये हुए व्यक्ति, जो पुत्रका गाढ़ आलिङ्गन किये हुए थे, त्रिपुराग्निसे जल रहे थे। वहाँ प्रचण्ड अग्निके कारण प्रलयकालीन संताप परिव्याप्त था। उस त्रिपुराग्निसे कुछ लोग पत्नीकी गोदमें छिपे हुए ही भस्म हो गये तो कुछ लोग माँ-बापसे चिपके हुए ही जलकर भस्मसात् हो गये। उस प्रज्वलित त्रिपुरमें अप्सराओंके समान सुन्दरी स्त्रियाँ अग्निकी ज्वालाओंसे झुलसकर पृथ्वीपर गिर रही थीं। कोई मोतीकी मालाओंसे अलंकृत विशाल नेत्रोंवाली षोडशवर्षीया नायिका धूएँसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। कोई इन्द्रनील मणिसे अलंकृत स्वर्णके समान कान्तिवाली स्त्री पतिको गिरा हुआ देखकर उसीके ऊपर गिर पड़ी। कोई सूर्यके समान तेजस्विनी नारी घरमें ही स्थित रहकर सो रही थी, वह अग्निकी ज्वालासे चेतनारहित होकर धराशायी हो गयी। उसी समय अतिशय बलशाली एक दानव हाथमें तलवार लेकर उठ खड़ा हुआ, किंतु अग्निसे जलकर वह भी पृथ्वीपर गिर पड़ा। मेघके समान श्यामवर्णकी दूसरी स्त्री, जो हार और केयूरसे अलंकृत तथा श्वेतवस्त्र पहने हुए अपने दुधमुँहे बच्चेको सुलाये हुए थी, वह उस बच्चेको जलते हुए देखकर मेघके शब्दके समान रोने लगी। इस प्रकार शंकरजीके कोपसे प्रेरित वह अग्नि त्रिपुरको जला रही थी॥ २७-३९ १/२ ॥ | | सुतमालिङ्ग्य वेपन्ती दग्धा पतति भूतले।<br>काचित् कुन्देन्दुवर्णाभा क्रीडन्ती स्वगृहे स्थिता ॥ ४१<br>गृहे प्रज्वलिते सा तु प्रतिबुद्धा शिखार्दिता।<br>पश्यन्ती ज्वलितं सर्वं हा सुतो मे कथं गतः ॥ ४२<br>सुतं संदग्धमालिङ्ग्य पतिता धरणीतले।<br>आदित्योदयवर्णाभा लक्ष्मीवदनशोभना ॥ ४३<br>त्वरिता दह्यमाना सा पतिता धरणीतले।<br>काचित् सुवर्णवर्णाभा नीलरत्नैर्विभूषिता ॥ ४४ | कोई चन्द्रके समान कान्तिवाली एवं हीरक और वैदूर्यसे अलंकृत सज्जन नायिका अपने पुत्रको गोदमें लेकर काँपती हुई जलकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। कोई कुन्द-पुष्प एवं चन्द्रमाके समान कान्तिवाली स्त्री क्रीडा करती हुई अपने घरमें ही सो रही थी, वह घरके जलनेपर अग्निशिखासे पीड़ित हो जाग उठी और सबको जलता हुआ देखकर 'हा! मेरा पुत्र कहाँ चला गया?' ऐसा कहती हुई जलते हुए पुत्रका आलिङ्गन कर पृथ्वीपर गिर पड़ी। उदयकालीन सूर्यके समान कान्तिसे युक्त एवं लक्ष्मीके मुखके समान शोभायमान मुखवाली कोई स्त्री भागती हुई जलकर पृथ्वीपर गिर गयी। कोई स्वर्णके समान कान्तिवाली नीलरत्नोंसे अलंकृत स्त्री |