भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७८८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अपरीक्ष्य त्वहं दग्धः शंकरेण महात्मना।<br>नान्यः शक्तिस्तु मां हन्तुं वर्जयित्वा त्रिलोचनम्॥ ६०<br>उत्थितः शिरसा कृत्वा लिङ्गं त्रिभुवनेश्वरम्।<br>निर्गतः स पुरद्वारात् परित्यज्य सुहृत्सुतान्॥ ६१<br>रत्नानि यान्यनर्घाणि स्त्रियो नानाविधास्तथा।<br>गृहीत्वा शिरसा लिङ्गं गच्छन् गगनमण्डलम्॥ ६२<br>स्तुवंश्च देवदेवेशं त्रिलोकाधिपतिं शिवम्।<br>त्यक्ता पुरी मया देव यदि वध्योऽस्मि शंकर॥ ६३<br>त्वत्प्रसादान्महादेव मा मे लिङ्गं विनश्यतु।<br>अर्चितं हि मया देव भक्त्या परमया सदा॥ ६४<br>त्वत्कोपाद् यदि वध्योऽहं तदिदं मा विनश्यतु।<br>श्लाघ्यमेतन्महादेव त्वत्कोपाद् दहनं मम॥ ६५<br>प्रतिजन्म महादेव त्वत्पादनिरतो ह्यहम्।<br>तोटकच्छन्दसा देव स्तौमि त्वां परमेश्वर॥ ६६किया और महात्मा शंकरने भी बिना विचारे ही मुझे जला दिया। उन त्रिलोचनको छोड़कर अन्य कोई भी मेरा विनाश नहीं कर सकता। तब वह सिंहासनसे उठ खड़ा हुआ और त्रिभुवनपति शंकरके लिङ्गको सिरपर धारणकर मित्र, पुत्र, बहुमूल्य रत्नों, स्त्रियों और अन्यान्य अनेक प्रकारके पदार्थोंको छोड़कर नगरद्वारसे बाहर निकला। वह लिङ्गको सिरपर धारण कर गगनमण्डलमें जा पहुँचा और देवदेवेश त्रिभुवनपति शिवकी स्तुति करते हुए कहने लगा—'देव! मैंने अपनी पुरीका परित्याग कर दिया है। शंकर! यदि मैं वस्तुतः वध करने योग्य हूँ तो महादेव! आपकी कृपासे मेरा यह लिङ्ग विनष्ट न हो। देव! मैंने परमभक्तिके साथ सदा इसकी पूजा की है, अतः यदि मैं आपके कोपके कारण वध्य हूँ तो यह लिङ्ग विनष्ट न हो। महादेव! आपके कोपसे मेरा यह जल जाना प्रशस्त ही है। महादेव! प्रत्येक जन्ममें मैं आपके चरणोंमें ही लीन हूँ, अतः देवाधिदेव परमेश्वर! मैं तोटक-छन्दद्वारा आपकी स्तुति कर रहा हूँ॥ ५७—६६॥
शिव शंकर शर्व हराय नमो<br>भव भीम महेश्वर सर्व नमः।<br>कुसुमायुधदेहविनाशकर<br>त्रिपुरान्तक अन्धकशूलधर॥ ६७<br><br>प्रमदाप्रिय कान्त विरक्त नमः<br>ससुरासुरसिद्धगणैर्नमित।<br>हयवानरसिंहगजेन्द्रमुखै-<br>रतिह्रस्वसुदीर्घविशालमुखैः ॥ ६८<br><br>उपलब्धुमशक्यतरैरसुरैः<br>प्रथितोऽस्मि च बाहुशतैर्बहुभिः।<br>प्रणतोऽस्मि भवं भवभक्तिरत-<br>श्चलचन्द्रकलाङ्कुर देव नमः॥ ६९<br><br>न च पुत्रकलत्रहयादिधनं<br>मम तु त्वदनुस्मरणं शरणम्।<br>व्यथितोऽस्मि शरीरशतैर्बहुभि-<br>र्गमिता च महानरकस्य गतिः॥ ७०<br><br>न निवर्तति जन्म न पापमतिः<br>शुचिकर्म निबद्धमपि त्यजति।<br>अनुकम्पति विभ्रमति त्रसति<br>मम चैव कुकर्म निवारयति॥ ७१आप शिव, शंकर, शर्व और हरको नमस्कार है। भव, भीम, महेश्वर और सर्वभूतमयको प्रणाम है। आप कामदेवके शरीरके नाशक, त्रिपुरान्तक, अन्धक, त्रिशूलधर, आनन्दप्रिय, कान्त, विरक्त और सुर-असुर-सिद्धगणोंसे नमस्कृत हैं, आपको नमस्कार है। मैं अश्व, वानर, सिंह और गजेन्द्रके-से मुखोंवाले, अतिशय छोटे, विस्तृत विशालमुखोंसे युक्त और सैकड़ों भुजाओंसे सम्पन्न बहुत-से अजेय असुरोंद्वारा प्राप्त करनेके लिये अशक्यरूपसे विख्यात हूँ। शिवजीकी भक्तिमें लीन रहनेवाला वही मैं भवके चरणोंमें प्रणिपात कर रहा हूँ। चञ्चल चन्द्रकलासे सुशोभित देव! आपको नमस्कार है। ये पुत्र, स्त्री, अश्वादि वैभव मेरे नहीं हैं, मेरे लिये तो आपका चिन्तन ही एकमात्र शरण है। मैं सैकड़ों शरीर (जन्म) धारण कर पीड़ित हो चुका हूँ। आगे महानरकमें पड़नेकी सम्भावना है। न जन्मसे छुटकारा मिलेगा, न पापबुद्धि ही निवृत्त होगी, शुद्ध कर्ममें लगा हुआ भी मन उसे छोड़ देता है, काँपता है, भ्रमित होता है और भयभीत होता है। मेरे ही कुकर्म अच्छे कर्मोंसे मुझे हटाते हैं।