मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १९२ * | ८०३ |
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एक सौ बानबेवाँ अध्याय
शुक्लतीर्थका माहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मार्कण्डेय उवाच<br><br>भार्गवेशं ततो गच्छेद् भग्नो यत्र जनार्दनः।<br>असुरैस्तु महायुद्धे महाबलपराक्रमैः॥ १<br>हुंकारितास्तु देवेन दानवाः प्रलयं गताः।<br>तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २<br>शुक्लतीर्थस्य चोत्पत्तिं शृणु त्वं पाण्डुनन्दन।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये नानाधातुविचित्रिते॥ ३<br>तरुणादित्यसंकाशे तप्तकाञ्चनप्रभे।<br>वज्रस्फटिकसोपाने चित्रपट्टशिलातले॥ ४<br>जाम्बूनदमये दिव्ये नानापुष्पोपशोभिते।<br>तत्रासीनं महादेवं सर्वज्ञं प्रभुमव्ययम्॥ ५<br>लोकानुग्रहकर्तारं गणवृन्दैः समावृतम्।<br>स्कन्दनन्दिमहाकालैर्वीरभद्रगणादिभिः ।<br>उमया सहितं देवं मार्कण्डिः पर्यपृच्छत॥ ६<br>देवदेव महादेव ब्रह्मविष्ण्विन्द्रसंस्तुत।<br>संसारभयभीतोऽहं सुखोपायं ब्रवीहि मे॥ ७<br>भगवन् भूतभव्येश सर्वपापप्रणाशनम्।<br>तीर्थानां परमं तीर्थं तद् वदस्व महेश्वर॥ ८ | मार्कण्डेयजीने पूछा— राजेन्द्र! तदनन्तर भार्गवेशतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ एक बार भगवान् जनार्दन महायुद्धमें महाबली असुरोंके साथ युद्ध करते-करते थक गये, फिर उन प्रभुके हुंकारसे ही दानवगण नष्ट हो गये थे। वहाँ स्नान करनेसे मानव सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। पाण्डुनन्दन! अब आप शुक्लतीर्थकी उत्पत्ति सुनिये। किसी समय विविध धातुओंसे रंग-बिरंगे हिमवान् पर्वतके मनोरम शिखरपर, जो मध्याह्नकालिक सूर्यके समान देदीप्यमान, तपाये हुए सोनेकी प्रभासे युक्त, हीरक और स्फटिककी सीढ़ियोंसे सुशोभित था, एक दिव्य सुवर्णमय तथा अनेक पुष्पोंसे विभूषित शिलातलपर सर्वज्ञ, सामर्थ्यशाली, अविनाशी, लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले महादेव स्कन्द, नन्दी, महाकाल, वीरभद्र आदि गणों तथा अन्यान्य गणसमूहोंसे घिरे हुए उमाके साथ बैठे हुए थे। उसी समय मार्कण्डेयजीने उनसे पूछा—'ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रसे वन्दित, देवाधिदेव महादेव! मैं संसार-भयसे भीत हूँ, मुझे सुखका साधन बतलाइये। ऐश्वर्यशाली महेश्वर! आप भूत और भविष्यके स्वामी हैं, अतः जो सभी पापोंका विनाशक एवं तीर्थोंमें श्रेष्ठ हो, वह तीर्थ मुझे बतलाइये॥ १—८॥ |
| ईश्वर उवाच<br><br>शृणु विप्र महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद।<br>स्नानाय गच्छ सुभगं ऋषिसङ्घैः समावृतः॥ ९<br>मन्वत्रिकश्यपाश्चैव याज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः।<br>यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती॥ १०<br>नारदो गौतमश्चैव सेवन्ते धर्मकाङ्क्षिणः।<br>गङ्गा कनखले पुण्या प्रयागं पुष्करं गयाम्॥ ११<br>कुरुक्षेत्रं महापुण्यं राहुग्रस्ते दिवाकरे।<br>दिवा वा यदि वा रात्रौ शुक्लतीर्थं महाफलम्॥ १२ | भगवान् शंकरने कहा— महाबुद्धिमान् विप्र! तुम तो सकलशास्त्रविशारद और सौभाग्यशाली हो, तुम मेरी बात सुनो और ऋषियोंके साथ स्नान करनेके लिये शुक्लतीर्थमें जाओ। मनु, अत्रि, कश्यप, याज्ञवल्क्य, उशना, अङ्गिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, नारद और गौतम—ये ऋषिगण धर्मकी अभिलाषासे युक्त हो उसी तीर्थका सेवन करते हैं। गङ्गा कनखलमें पुण्यको देनेवाली है, सूर्यग्रहणके समय प्रयाग, पुष्कर, गया और कुरुक्षेत्र विशिष्ट पुण्यदायक हो जाते हैं, किंतु शुक्लतीर्थ दिन या रात—सभी समय महान् पुण्यफल देनेवाला है। |