भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८०८ * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततः स्मृतोऽथ देवेन धर्मरूपो वृषस्तदा।<br>स्मरणात्तस्य देवस्य वृषः शीघ्रमुपस्थितः।<br>वदंस्तु मानुषीं वाचमादेशो दीयतां प्रभो॥ २९दिखाकर विश्वस्त कर रहा हूँ। तत्पश्चात् शिवजीने उस समय धर्मरूपी वृषभका स्मरण किया। उन देवके स्मरण करते ही वह वृष शीघ्र ही उपस्थित हो गया और मनुष्यकी वाणीमें बोला—'प्रभो! आदेश दीजिये'॥ २८-२९॥
महेश्वर उवाच<br>वल्मीकं त्वं खनस्वैनं विप्रं भूमौ निपातय।<br>योगस्थस्तु ततो ध्यायन् भृगुस्तेन निपातितः॥ ३०<br>तत्क्षणात् क्रोधसंतप्तो हस्तमुत्क्षिप्य सोऽशपत्।<br>एवं सम्भाषमाणस्तु कुत्र गच्छसि भो वृष।<br>अद्याहं सम्प्रकोपेण प्रलयं त्वां नये वृष॥ ३१<br>धर्षितस्तु तदा विप्रश्चान्तरिक्षं गतो वृषम्।<br>आकाशे प्रेक्षते विप्र एतदद्भुतमुत्तमम्॥ ३२<br>तत्र प्रहसितो रुद्र ऋषिरग्रे व्यवस्थितः।<br>तृतीयलोचनं दृष्ट्वा वैलक्ष्यात् पतितो भुवि।<br>प्रणम्य दण्डवद् भूमौ तुष्टाव परमेश्वरम्॥ ३३महेश्वरने कहा—तुम इस विमवटको खोद डालो और विप्रको भूमिपर गिरा दो। तब वृषने ध्यान करते हुए योगस्थ भृगुको भूमिपर गिरा दिया। उसी क्षण क्रोधसे जले-भुने भृगु हाथ उठाकर शाप देते हुए इस प्रकार बोले—'भो वृष! तुम कहाँ जा रहे हो? वृष! अभी मैं क्रोधके बलसे तुम्हारा संहार कर डालता हूँ।' तब वह वृषभ उस विप्रको परास्तकर आकाशमें चला गया। उसे आकाशमें देखते हुए भृगु सोचने लगे—'यह तो महान् आश्चर्य है।' इतनेमें ही वहाँ भगवान् रुद्र हँसते हुए ऋषिके सम्मुख उपस्थित हो गये। तब तृतीय नेत्रधारी रुद्रको देखकर भृगु व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और दण्डके समान भूमिपर लेटकर प्रणाम कर भगवान् शंकरकी स्तुति करने लगे॥ ३०-३३॥
प्रणिपत्य भूतनाथं भवोद्भवं त्वामहं दिव्यरूपम्।<br>भवातीतो भुवनपते प्रभो तु विज्ञापये किञ्चित्॥ ३४<br><br>तद्गुणनिकरान् वक्तुं कः शक्तो भवति मानुषो नाम।<br>वासुकिरपि हि कदाचिद् वदनसहस्रं भवेद् यस्य॥ ३५<br><br>भक्त्या तथापि शंकर भुवनपते त्वत्स्तुतौ मुखरः।<br>वदतः क्षमस्व भगवन् प्रसीद मे तव चरणपतितस्य॥ ३६<br><br>सत्त्वं रजस्तमस्त्वं स्थित्युत्पत्त्योर्विनाशने देव।<br>त्वां मुक्त्वा भुवनपते भुवनेश्वर नैव दैवतं किञ्चित्॥ ३७<br><br>यमनियमयज्ञदानवेदाभ्यासाश्च धारणा योगः।<br>त्वद्भक्तेः सर्वमिदं नार्हति हि कलासहस्त्रांशम्॥ ३८<br><br>उच्छिष्टरससायनखड्गाञ्जनपादुकाविवरसिद्धिर्वा।<br>चिह्नं भवव्रतानां दृश्यति चेह जन्मनि प्रकटम्॥ ३९त्रिभुवनके स्वामी प्रभो! आप प्राणिवर्गके स्वामी, संसारके उद्भवस्थान, दिव्य रूपधारी और जन्म-मरणसे परे हैं, मैं आपको प्रणाम करके कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। यद्यपि कदाचित् किसी मानवको वासुकि समान हजार मुख हो जाय तो भी ऐसा कोई भी मनुष्य आपके गुणसमूहोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हो सकता, तथापि भुवनपते शंकर! मैं भक्तिपूर्वक आपकी स्तुति करनेके लिये उद्यत हूँ। भगवन्! अपने चरणोंमें पड़े हुए मुझपर प्रसन्न हो जाइये और बोलते समय घटित हुई त्रुटियोंके लिये मुझे क्षमा कीजिये। देव! विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और लयमें आप ही सत्त्व, रज और तमस्वरूप हैं। भुवनपते! आपको छोड़कर अन्य कोई देवता नहीं है। भुवनेश्वर! यम, नियम, यज्ञ, दान, वेदाभ्यास, धारणा और योग—ये सभी आपकी भक्तिकी एक कलाके हजारवें अंशकी समता नहीं कर सकते। उच्छिष्ट, रस-रसायन, खड्ग, अञ्जन, पादुका और विवरसिद्धि—ये सभी महादेवकी आराधना करनेवालोंके चिह्न हैं, जो इस जन्ममें व्यक्त-रूपसे देखे जाते हैं॥ ३४-३९॥
शाठ्येन नमति यद्यपि ददासि त्वं भूतिमिच्छतो देव।<br>भक्तिर्भवभेदकरी मोक्षाय विनिर्मिता नाथ॥ ४०देव! यद्यपि भक्त शठतापूर्वक नमस्कार करता है, तथापि आप उसे इच्छानुसार ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। नाथ! आपने मोक्ष प्रदान करनेके लिये संसारको नष्ट करनेवाली