भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 822, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 822
८१२* मत्स्यपुराण *
ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिता।<br>भृगुतीर्थे तु राजेन्द्र तीर्थकोटिर्व्यवस्थिता॥ ८४<br>अकामो वा सकामो वा तत्र स्नानं समाचरेत् ।<br>अश्वमेधमवाप्नोति दैवतैः सह मोदते ॥ ८५<br>तत्र सिद्धिं परां प्राप्तो भृगुस्तु मुनिपुङ्गवः ।<br>अवतारः कृतस्तत्र शंकरेण महात्मना ॥ ८६वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर करोड़ ब्राह्मणोंके भोजन करानेका फल होता है। राजेन्द्र! भृगुतीर्थमें करोड़ों तीर्थोंकी स्थिति है। वहाँ निष्काम या सकाम होकर भी स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है और वह देवताओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है। वहाँ मुनिश्रेष्ठ भृगुने परम सिद्धि प्राप्त की थी और महात्मा शंकर अवतीर्ण हुए थे॥ ८०–८६॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें नर्मदामाहात्म्य-वर्णन नामक एक सौ तिरानवेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९३॥


एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय

नर्मदातटवर्ती तीर्थोंका माहात्म्य

मार्कण्डेय उवाचमार्कण्डेयजीने कहा—
ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ह्यङ्कुशेश्वरमुत्तमम्।<br>दर्शनात् तस्य देवस्य मुच्यते सर्वपातकैः॥ १<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र नर्मदेश्वरमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोके महीयते॥ २<br>अश्वतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्।<br>सुभगो दर्शनीयश्च भोगवाञ्जायते नरः॥ ३<br>पैतामहं ततो गच्छेद् ब्रह्मणा निर्मितं पुरा।<br>तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या पितृपिण्डं तु दापयेत्॥ ४<br>तिलदर्भविमिश्रं तु ह्युदकं तत्र दापयेत्।<br>तस्य तीर्थप्रभावेण सर्वं भवति चाक्षयम्॥ ५<br>सावित्रीतीर्थमासाद्य यस्तु स्नानं समाचरेत्।<br>विधूय सर्वपापानि ब्रह्मलोके महीयते॥ ६<br>मनोहरं ततो गच्छेत् तीर्थं परमशोभनम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् पितृलोके महीयते॥ ७<br>ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र मानसं तीर्थमुत्तमम्।<br>तत्र स्नात्वा नरो राजन् रुद्रलोके महीयते॥ ८<br>ततो गच्छेच्च राजेन्द्र कुञ्जतीर्थमनुत्तमम्।<br>विख्यातं त्रिषु लोकेषु सर्वपापप्रणाशनम्॥ ९<br>यान् यान् कामयते कामान् पशुपुत्रधनानि च।<br>प्राप्नुयात् तानि सर्वाणि तत्र स्नात्वा नराधिप॥ १०राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ अङ्कुशेश्वरतीर्थकी यात्रा करे, जहाँ उन देवके दर्शन-मात्रसे मनुष्य सभी पापोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ नर्मदेश्वरतीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य स्वर्गलोकमें पूजित होता है। तदुपारन्त अश्वतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य सौभाग्यशाली, दर्शनीय और रूपवान् हो जाता है। इसके बाद प्राचीनकालमें ब्रह्माद्वारा निर्मित पैतामहतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर भक्तिपूर्वक पितरोंको पिण्डदान करे तथा तिल और कुशसे युक्त तर्पण करे; क्योंकि उस तीर्थके प्रभावसे वहाँ किया गया यह सब अक्षय हो जाता है। जो सावित्रीतीर्थमें जाकर स्नान करता है, वह अपने सभी पापोंको धोकर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। राजन्! तदनन्तर अतिशय रमणीय मनोहर-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिये। वहाँ स्नानकर मनुष्य पितृलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ मानसतीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ स्नानकर मनुष्य रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र! तदुपारन्त श्रेष्ठ कुञ्जतीर्थकी यात्रा करे। तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध यह तीर्थ सभी पापोंका नाशक है। नराधिप! मनुष्य, पशु, पुत्र, धन आदि जिन-जिन वस्तुओंकी कामना करता है, वह सब उसे वहाँ स्नान करनेसे प्राप्त हो जाता है॥ १–१०॥