भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८२२ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्र्यार्षेयाभिमतास्तेषां सर्वेषां प्रवराः शुभाः।<br>अङ्गिराश्चैव ताण्डिश्च मौद्गल्यश्च महातपाः॥ ४४<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः।<br>अपाण्डुश्च गुरुश्चैव तृतीयः शाकटायनः।<br>ततः प्रागाथमा नारी मार्कण्डो मरणः शिवः॥ ४५<br>कटुर्मर्कटपश्चैव तथा नाडायनो ह्यृषिः।<br>श्यामायनस्तथैवैषां त्र्यार्षेयाः प्रवराः शुभाः॥ ४६<br>अङ्गिराश्चाजमीढश्च कत्यश्चैव महातपाः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४७ये सभी अङ्गिरा, ताण्डि तथा महातपस्वी मौद्गल्य—इन तीनों ऋषियोंके प्रवर माने गये हैं। इनके वंशधरोंमें भी विवाह नहीं होता। अपाण्डु, गुरु, शाकटायन, प्रागाथमा, नारी, मार्कण्ड, मरण, शिव, कटु, मर्कटप, नाडायन तथा श्यामायन—ये सभी अङ्गिरा, अजमीढ तथा महातपस्वी कत्य—इन तीन ऋषियोंके प्रवरवाले माने गये हैं। इनमें भी परस्पर विवाह नहीं होते।
तित्तिरिः कपिभूश्चैव गार्ग्यश्चैव महानृषिः।<br>त्र्यार्षेयो हि मतस्तेषां सर्वेषां प्रवरः शुभः॥ ४८<br>अङ्गिरास्तित्तिरिश्चैव कपिभूश्च महानृषिः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ४९तित्तिरि, कपिभू और महर्षि गार्ग्य—इन सबके अङ्गिरा, तित्तिरि तथा कपिभू नामक तीन प्रवर कहे गये हैं, जिनमें एक-दूसरेका विवाह निषिद्ध है।
अथ ऋक्षभरद्वाजौ ऋषिवान् मानवस्तथा।<br>ऋषिमैत्रवरश्चैव पञ्चार्षेयाः प्रकीर्तिताः॥ ५०<br>अङ्गिरा सभरद्वाजस्तथैव च बृहस्पतिः।<br>ऋषिमैत्रवरश्चैव ऋषिवान् मानवस्तथा।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ५१ऋक्ष, भरद्वाज, ऋषिवान्, मानव तथा मैत्रवर—ये पाँच आर्षेय कहे गये हैं। इनके अङ्गिरा, भरद्वाज, बृहस्पति, मैत्रवर, ऋषिवान् तथा मानव नामक पाँच प्रवर हैं। इनमें परस्पर विवाह नहीं होता।
भारद्वाजो हुतः शौङ्गः शैशिरेयस्तथैव च।<br>इत्येते कथिताः सर्वे द्वयामुष्यायणगोत्रजाः॥ ५२<br>पञ्चार्षेयास्तथा ह्येषां प्रवराः परिकीर्तिताः।<br>अङ्गिराश्च भरद्वाजस्तथैव च बृहस्पतिः॥ ५३<br>मौद्गल्यः शैशिरश्चैव प्रवराः परिकीर्तिताः।<br>परस्परमवैवाह्या ऋषयः परिकीर्तिताः॥ ५४भारद्वाज, हुत, शौङ्ग तथा शैशिरेय—ये सभी द्व्यामुष्यायण गोत्रमें उत्पन्न कहे गये हैं। इन सबके अङ्गिरा, भरद्वाज, बृहस्पति, मौद्गल्य तथा शैशिर नामक पाँच प्रवर हैं। इनमें भी परस्पर विवाह नहीं होता।
एते तवोक्ताङ्गिरसस्तु वंशे<br>महानुभावा ऋषिगोत्रकाराः।<br>येषां तु नाम्ना परिकीर्तितेन<br>पापं समग्रं पुरुषो जहाति॥ ५५इस प्रकार मैंने आपसे इस अङ्गिरा-वंशमें उत्पन्न होनेवाले गोत्रप्रवर्तक महानुभाव ऋषियोंका वर्णन कर दिया, जिनके नामका उच्चारण करनेसे पुरुष अपने सभी पापोंसे छुटकारा पा लेता है॥ ४१—५५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रवरानुकीर्तनेऽङ्गिरोवंशकीर्तनं नाम षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रवरानुकीर्तनप्रसङ्गमें अङ्गिरावंशवर्णन नामक एक सौ छानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९६॥