मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८३४ * मत्स्यपुराण *
| मनो मनुश्च प्राणश्च नरोषा नोच वीर्यवान्।<br>चित्तहार्योऽयनश्चैव हंसो नारायणस्तथा॥ ११<br>विभुश्चापि प्रभुश्चैव साध्या द्वादश कीर्तिताः।<br>विश्वायाश्च तथा पुत्रा विश्वेदेवाः प्रकीर्तिताः॥ १२<br>क्रतुर्दक्षो वसुः सत्यः कालकामो मुनिस्तथा।<br>कुरजो मनुजो वीजो रोचमानश्च ते दश॥ १३<br>एतावदुक्तस्तव धर्मवंशः संक्षेपतः पार्थिववंशमुख्य।<br>व्यासेन वक्तुं न हि शक्यमस्ति राजन् विना वर्षशतैरनेकैः॥ १४ | कहे गये हैं। मन, मनु, प्राण, नरोषा, नोच, वीर्यवान्, चित्तहार्य, अयन, हंस, नारायण, विभु और प्रभु—ये बारह साध्य कहे गये हैं। विश्वाके पुत्र विश्वेदेव कहे जाते हैं। क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, कालकाम, मुनि, कुरज, मनुज, बीज और रोचमान—ये दस विश्वेदेव हैं। राजवंशश्रेष्ठ! मैंने आपसे यहाँतक धर्मके वंशका संक्षेपसे वर्णन कर दिया। राजन्! अनेक सैकड़ों वर्षोंके बिना इसका विस्तारसे वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ ८—१४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे धर्मवंशवर्णने धर्मप्रवरानुकीर्तनं नाम त्र्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके धर्मवंशवर्णनमें धर्म-प्रवरानुकीर्तन नामक दो सौ तीनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०३॥
दो सौ चारवाँ अध्याय
श्राद्धकल्प—पितृगाथा-कीर्तन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| एतद्वंशभवा विप्राः श्राद्धे भोज्याः प्रयत्नतः।<br>पितॄणां वल्लभं यस्मादेषु श्राद्धं नरेश्वर॥ १ | नरेश्वर! इन धर्मके वंशमें उत्पन्न हुए विप्रोंको श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक भोजन कराना चाहिये; क्योंकि इन ब्राह्मणोंके सम्बन्धसे किया हुआ श्राद्ध पितरोंको अतिशय प्रिय है। |
| अतः परं प्रवक्ष्यामि पितृभिर्याः प्रकीर्तिताः।<br>गाथाः पार्थिवशार्दूल कामयद्भिः पुरे स्वके॥ २ | राजसिंह! इसके बाद अब मैं उस गाथाका वर्णन कर रहा हूँ जिसका अपने पुरमें स्थित कामना करनेवाले पितरोंने कथन किया था। |
| अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यो नो दद्याज्जलाञ्जलिम्।<br>नदीषु बहुतोयासु शीतलासु विशेषतः॥ ३ | क्या हमलोगोंके वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो अधिक एवं शीतल जलवाली नदियोंमें जाकर हमलोगोंको जलाञ्जलि देगा? |
| अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यः श्राद्धं नित्यमाचरेत्।<br>पयोमूलफलैर्भक्ष्यैस्तिलतोयेन वा पुनः॥ ४ | क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो दूध, मूल, फल और खाद्य सामग्रियोंसे या तिलसहित जलसे नित्य श्राद्ध करेगा? |
| अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं यो नो दद्यात्त्रयोदशीम्।<br>पायसं मधुसर्पिर्भ्यां वर्षासु च मघासु च॥ ५ | क्या हमारे वंशमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा जो वर्षा-ऋतुके मघानक्षत्रकी त्रयोदशी तिथिको मधु और घीसे मिश्रित दूधमें पका हुआ खाद्य पदार्थ हमें समर्पित करेगा? |
| अपि स्यात् स कुलेऽस्माकं खड्गमांसेन यः सकृत्।<br>श्राद्धं कुर्यात् प्रयत्नेन कालशाकेन वा पुनः॥ ६ | क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा व्यक्ति जन्म लेगा, जो कालशाकसे श्राद्ध करेगा? |
| कालशाकं महाशाकं मधु मुन्यन्नमेव च।<br>विषाणवर्जा ये खड्गा आसूर्यं तदशीमहि॥ ७ | कालशाक, महाशाक, मधु और मुनिजनोंके अनुकूल अन्नोंको हमलोग सूर्यास्तसे पूर्व ही ग्रहण करते हैं। |
| गयायां दर्शने राहोः खड्गमांसेन योगिनाम्।<br>भोजयेत् कः कुलेऽस्माकं छायायां कुञ्जरस्य च॥ ८ | हमारे कुलमें उत्पन्न हुआ कौन व्यक्ति सूर्यग्रहणके अवसरपर अर्थात् राहुके दर्शनकालतक गयातीर्थमें एवं गजच्छायायोगमें योगियोंको फलके गूदेका भोजन करायेगा? |