मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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८४२ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| श्वेतं तु जठरं यस्य भवेत् पृष्ठं च गोपतेः।<br>वृषभः स समुद्राक्षः सततं कुलवर्धनः॥ २४<br><br>मल्लिकापुष्पचित्रश्च धन्यो भवति पुङ्गवः।<br>कमलैर्मण्डलैश्चापि चित्रो भवति भाग्यदः॥ २५<br><br>अतसीपुष्पवर्णश्च तथा धन्यतरः स्मृतः।<br>एते धन्यास्तथाऽन्यान् कीर्तयिष्यामि ते नृप॥ २६<br><br>कृष्णतालवोष्ठवदना रूक्षशृङ्गशफाश्च ये।<br>अव्यक्तवर्णा ह्रस्वाश्च व्याघ्रसिंहनिभाश्च ये॥ २७<br><br>ध्वाङ्क्षगृध्रसवर्णाश्च तथा मूषकसंनिभाः।<br>कुण्ठाः काणास्तथा खञ्जाः केकराक्षास्तथैव च॥ २८<br><br>विषमश्वेतपादाश्च उद्भ्रान्तनयनास्तथा।<br>नैते वृषाः प्रमोक्तव्या न च धार्यास्तथा गृहे॥ २९<br><br>मोक्तव्यानां च धार्याणां भूयो वक्ष्यामि लक्षणम्।<br>स्वस्तिकाकारशृङ्गाश्च तथा मेघौघनिःस्वनाः॥ ३०<br><br>महाप्रमाणाश्च तथा मत्तमातङ्गगामिनः।<br>महोरस्का महोच्छाया महाबलपराक्रमाः।<br>शिरः कर्णौ ललाटं च वालधिश्चरणास्तथा॥ ३१<br><br>नेत्रे पार्श्वे च कृष्णानि शस्यन्ते चन्द्रभासिनाम्।<br>श्वेतान्येतानि शस्यन्ते कृष्णस्य तु विशेषतः॥ ३२<br><br>भूमौ कर्षति लाङ्गूलं प्रलम्बस्थूलवालधिः।<br>पुरस्तादुद्यतो नीलो वृषभश्च प्रशस्यते॥ ३३ | जिस वृषभका पेट तथा पीठ श्वेतवर्ण हो, वह समुद्राक्ष नामक वृषभ कहा जाता है। वह सर्वदा कुलकी वृद्धि करनेवाला होता है। जो वृष मल्लिकाके फूलके समान चितकबरे रंगवाला होता है, वह धन्य है। जो कमल-मण्डलके समान चितकबरा होता है, वह सौभाग्यवर्द्धक होता है तथा अलसीके फूलके समान नीले रंगवाला बैल धन्यतर कहा गया है। राजन्! ये उत्तम लक्षणोंवाले वृष हैं। अब मैं आपसे अशुभ लक्षणसम्पन्न वृषभोंका वर्णन कर रहा हूँ। जो काले तालु, ओंठ और मुखवाले, रूखे सींगों एवं खुरोंवाले, अव्यक्त रंगवाले, नाटे, बाघ तथा सिंहके समान भयानक, कौवे और गृध्रके समान रंगवाले या मूषकके समान अल्पकाय, मन्द स्वभाववाले, काने, लँगड़े, नीची-ऊँची आँखोंवाले, विषम (तीन या एक) पैरोंमें श्वेत रंगवाले तथा चञ्चल नेत्रोंवाले हों, ऐसे वृषभोंका न तो उत्सर्ग करना चाहिये और न उन्हें अपने घरमें ही रखना ठीक है। मैं पुनः उत्सर्ग करने तथा पालने योग्य (श्रेष्ठ) वृषभोंका लक्षण बतला रहा हूँ। जिनके सींग स्वस्तिकके आकारके हों और स्वर बादलोंकी गर्जनाके सदृश हो, जो ऊँचे कदवाले, हाथीके समान चलनेवाले, विशाल छातीवाले, बहुत ऊँचे, महान् बल-पराक्रमसे युक्त हों तथा चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णके जिन वृषभोंके सिर, दोनों कान, ललाट, पूँछ, चारों पैर, दोनों नेत्र, दोनों बगलें काले रंगके हों एवं काले रंगवाले वृषभोंके ये स्थान श्वेत हों तो वे उत्तम माने गये हैं। जिसकी लम्बी और मोटी पूँछ पृथ्वीपर रगड़ खाती हो और जिसका अगला भाग उठा हुआ हो, वह नील वृषभ प्रशंसनीय माना गया है॥ २३—३३॥ |
| शक्तिध्वजपताकाढ्या येषां राजी विराजते।<br>अनड्वाहस्तु ते धन्याश्चित्रसिद्धिर्जयावहाः॥ ३४ | जिनके शरीरमें शक्ति, ध्वज और पताकाओंकी रेखा बनी हो, वे वृषभ धन्य हैं और विचित्र सिद्धि एवं विजय प्रदान करनेवाले हैं। |
| प्रदक्षिणं निवर्तन्ते स्वयं ये विनिवर्तिताः।<br>समुन्नतशिरोग्रीवा धन्यास्ते यूथवर्धनाः॥ ३५ | जो घुमाये जानेपर या स्वयं घूमनेपर दाहिनी ओर घूमते हों तथा जिनके सिर एवं कंधे समुन्नत हों, वे धन्य तथा अपने समूहके वृद्धिकारक हैं। |
| रक्तशृङ्गाग्रनयनः श्वेतवर्णो भवेद् यदि।<br>शफैः प्रवालसदृशैर्नास्ति धन्यतरस्ततः॥ ३६ | जिसके सींगोंके अग्रभाग तथा नेत्र लाल हों और वह यदि श्वेतवर्णका हो तथा उसके खुर प्रवालके समान लाल हों तो उससे श्रेष्ठ कोई वृषभ नहीं होता। |
| एते धार्याः प्रयत्नेन मोक्तव्या यदि वा वृषाः।<br>धारिताश्च तथा मुक्ता धनधान्यप्रवर्धनाः॥ ३७ | ऐसे वृषभोंका प्रयत्नपूर्वक पालन अथवा उत्सर्ग करना चाहिये; क्योंकि ये रखने अथवा उत्सर्ग करने—दोनों दशाओंमें धन-धान्यको बढ़ाते हैं। |