भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 864, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 864
८५४* मत्स्यपुराण *
तत्रापि विन्दतस्त्राणं मृत्युना तस्य का गतिः।<br>न भयं मरणं चैव प्राणिनामभयं क्वचित्।<br>तत्रापि निर्भयाः सन्तः सदा सुकृतकारिणः॥ २७<br><br>यम उवाच<br>तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसंगतैः।<br>विना सत्यवतः प्राणान् वरं वरय मा चिरम्॥ २८<br><br>सावित्र्युवाच<br>वरयामि त्वया दत्तं पुत्राणां शतमौरसम्।<br>अनपत्यस्य लोकेषु गतिः किल न विद्यते॥ २९<br><br>यम उवाच<br>कृतेन कामेन निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सफलं यथोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्यात्<br>तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ ३०इतनेपर भी जो मृत्युसे रक्षाके उपाय सोचते हैं, उनकी क्या गति होगी? प्राणधारियोंको इस जगत्में केवल मृत्युसे भय ही नहीं है, उनके लिये कहीं अभयस्थान भी नहीं है। तथापि पुण्यवान् सत्पुरुष सर्वदा निर्भय होकर संसारमें जीवित रहते हैं॥ १९–२७॥<br><br>यमराज बोले— विशालाक्षि! तुम्हारी इन धर्मयुक्त बातोंसे मैं विशेष संतुष्ट हूँ, अतः तुम सत्यवान्‌के प्राणोंके अतिरिक्त अन्य वर माँग लो, देर मत करो॥ २८॥<br><br>सावित्रीने कहा— देव! मैं आपसे अपनी कोखसे उत्पन्न होनेवाले सौ पुत्रोंका वरदान माँगती हूँ; क्योंकि लोकोंमें पुत्रहीनकी सद्गति नहीं होती॥ २९॥<br><br>यमराज बोले— भद्रे! अब तुम शेष अभीष्ट कामनाको छोड़कर लौट जाओ, तुम्हारी यह याचना भी सफल होगी। इस प्रकार तुम्हारे अनुगमनसे मेरे कार्योंमें विघ्न होगा और तुम्हें भी कष्ट होगा, इसीलिये मैं तुमसे इस समय ऐसा कह रहा हूँ॥ ३०॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने तृतीयवरलाभो नाम द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें तृतीय वर-लाभ नामक दो सौ बारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१२॥


दो सौ तेरहवाँ अध्याय

सावित्रीकी विजय और सत्यवान्‌की बन्धन-मुक्ति

सावित्र्युवाच<br>धर्माधर्मविधानज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक।<br>त्वमेव जगतो नाथः प्रजासंयमनो यमः॥ १<br>कर्मणामनुरूपेण यस्माद् यमयसे प्रजाः।<br>तस्माद् वै प्रोच्यसे देव यम इत्येव नामतः॥ २<br>धर्मेणेमाः प्रजाः सर्वा यस्माद् रञ्जयसे प्रभो।<br>तस्मात् ते धर्मराजेति नाम सद्भिर्निगद्यते॥ ३<br>सुकृतं दुष्कृतं चोभे पुरोधाय यदा जनाः।<br>त्वत्सकाशं मृता यान्ति तस्मात् त्वं मृत्युरुच्यते॥ ४<br>कालं कलार्धं कलयन् सर्वेषां त्वं हि तिष्ठसि।<br>तस्मात् कालेति ते नाम प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः॥ ५<br>सर्वेषामेव भूतानां यस्मादन्तकरो महान्।<br>तस्मात् त्वमन्तकः प्रोक्तः सर्वदेवैर्महाद्युते॥ ६सावित्रीने कहा— धर्म-अधर्मके विधानको जाननेवाले एवं सभी धर्मोंके प्रवर्तक देव! आप ही जगत्‌के स्वामी तथा प्रजाओंका नियमन करनेवाले यम हैं। देव! चूँकि आप कर्मोंके अनुरूप प्रजाओंका नियमन करते हैं, इसलिये 'यम' नामसे पुकारे जाते हैं। प्रभो! चूँकि आप धर्मपूर्वक इस सारी प्रजाको आनन्दित करते हैं, इसीलिये सत्पुरुष आपको धर्मराज नामसे पुकारते हैं। लोग मरनेपर अपने सत्-असत्—दोनों प्रकारके कर्मोंको अपने आगे रखकर आपके समीप जाते हैं, इसलिये आप मृत्यु कहलाते हैं। आप सभी प्राणियोंके क्षण, कला आदिसे कालकी गणना करते रहते हैं, इसीलिये तत्त्वदर्शी लोग आपको 'काल' नामसे पुकारते हैं। महादीप्तिसम्पन्न! चूँकि आप संसारके सभी चराचर जीवोंके महान् अन्तकर्ता हैं, इसीलिये आप सभी देवताओंकेद्वारा 'अन्तक' कहे जाते हैं।
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