भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 884
८७४* मत्स्यपुराण *

| संस्पृष्टं सविषं तेन सद्यो भवति निर्विषम्।<br>मनोह्वया शमीपत्रं तुम्बिका श्वेतसर्षपाः॥ ८<br>कपित्थकुष्ठमञ्जिष्ठाः पित्तेन श्लक्ष्णकल्पिताः।<br>शुनो गोः कपिलायाश्च सौम्याक्षिसोऽपरो गदः॥ ९<br>विषजित्परमं कार्यं मणिरत्नं च पूर्ववत्।<br>मूषिका जतुका चापि हस्ते बध्वा विषापहा॥ १० | ले। उसका स्पर्श करनेसे विषयुक्त प्राणी तुरंत ही निर्विष हो जाता है। जटामांसी, शमीके पत्ते, तुम्बी, श्वेत सरसों, कपित्थ, कुष्ठ और मंजीठ—इन ओषधियोंको कुत्ते अथवा कपिला गौके पित्तके साथ भावना दे। यह सौम्याक्षिस नामक दूसरी विषनाशक ओषधि है। इसे भी पूर्ववत् मणि एवं रत्ननिर्मित अंगूठीमें रखकर धारण करना चाहिये। इसी प्रकार मूषिका और लाहको भी हाथमें बाँधनेसे विषका शमन होता है॥९-१०॥ | | हरेणुमांसी मञ्जिष्ठा रजनी मधुका मधु।<br>अक्षत्वक् सुरसं लाक्षा श्लपितं पूर्ववद् भुवि॥ ११<br>वादिन्त्राणि पताकाश्च पिष्टैरेतैः प्रलेपिताः।<br>श्रुत्वा दृष्ट्वा समाघ्राय सद्यो भवति निर्विषः॥ १२ | हर्रें, जटामांसी, मंजिष्ठा, हरिद्रा, महुआ, मधु, अक्षत्वक्, सुरसा और लाह—इन्हें भी पूर्ववत् कुत्तेके पित्तसे संयुक्त करके पृथ्वीमें गाड़ दे। फिर इनके लेपसे वाजों तथा पताकाओंपर लेप कर दे तो (विषाक्त प्राणी) उन्हें सुनकर, देखकर और सूँघकर तुरंत विषरहित हो जाता है। | | त्र्यूषणं पञ्चलवणं मञ्जिष्ठा रजनीद्वयम्।<br>सूक्ष्मैला त्रिवृतापत्रं विडङ्गानीन्द्रवारुणी॥ १३<br>मधूकं वेतसं क्षौद्रं विषाणे च निधापयेत्।<br>तस्मादुष्णाम्बुना मात्रं प्रामुक्तं योजयेत् ततः॥ १४<br>विषभुक्तं ज्वरं याति निर्विषं पित्तदोषकृत्। | तीनों कटु (आँवला, हर्रे, बहेरा), पाँचों नमक, मंजीठ, दोनों रजनी, छोटी इलायची, त्रिवृताका पत्ता, बिडंग, इन्द्रवारुणि, मधूक, वेतस तथा मधु—इन सबको सींगमें स्थापित कर दे, फिर वहाँसे निकालकर गर्म जलमें मिला दे। इसके द्वारा विष-भक्षणसे उद्भूत पित्तदोष उत्पन्न करनेवाला ज्वर शान्त हो जाता है। | | शुक्लं सर्जरसोपेतं सर्षपा एलवालुकैः॥ १५<br>सुवेगा तस्करसुरौ कुसुमैरर्जुनस्य तु।<br>धूपो वासगृहे हन्ति विषं स्थावरजङ्गमम्॥ १६<br>न तत्र कीटा न विषं दर्दुरा न सरीसृपाः।<br>न कृत्या कर्मणां चापि धूपोऽयं यत्र दह्यते॥ १७ | श्वेत धूप, सरसों, एलवालुक, सुवेगा, तस्कर, सुर और अर्जुनके पुष्प—इन ओषधियोंका धूपवास करनेवाले घरमें स्थित स्थावर-जङ्गम सभी विषको नष्ट कर देता है। जहाँ वह धूप जलाया जाता है, वहाँ कीट, विष, मेढ़क, रेंगनेवाले सर्पादि जीव तथा कर्मोंकी कृत्या—ये कोई भी नहीं रह सकते। | | कल्पितैश्चन्दनक्षीरपलाशद्रुमवल्कलेः ।<br>मूर्वैलावालुरसरानाकुलीतण्डुलीयकैः ॥ १८<br>क्वाथः सर्वोदकार्येषु काकमाचीयुतो हितः।<br>रोचनापत्रनेपालीकुङ्कुमैस्तिलकान् वहन्॥ १९<br>विषैर्न बाध्यतेऽस्माच्च नरनारीनृपप्रियः। | चन्दन, दुग्ध, पलाश-वृक्षकी छाल, मूर्वा, एलावालुक, सरसों, नाकुली, तण्डुलीय एवं काकमाचीका काढ़ा सभी प्रकारके विषयुक्त जलमें कल्याणकारी होता है। रोचनापत्र, नेपाली, केसरतिलक—इन ओषधियोंको धारण करनेसे मनुष्यको विषका कष्ट नहीं होता, विषदोष नष्ट हो जाता है और वह इसके प्रभावसे स्त्री, पुरुष और राजाका प्रिय हो जाता है॥११—१९३॥ | | चूर्णैर्हरिद्रामञ्जिष्ठाकिणिहीकणनिम्बजैः ॥ २०<br>दिग्धं निर्विषतामेति गात्रं सर्वविषार्दितम्।<br>शिरीषस्य फलं पत्रं पुष्पं त्वङ्न्मूलमेव च॥ २१<br>गोमूत्रघृष्टो ह्यगदः सर्वकर्मकरः स्मृतः। | हल्दी, मंजीठ, किणिही, पिप्पली और नीमके चूर्णका लेप करनेसे सभी प्रकारके विषसे पीड़ित शरीर विषरहित हो जाता है। शिरीष-वृक्षका फल, पत्ता, पुष्प, छाल और जड़—इन सबको गो-मूत्रमें घिसकर तैयार की गयी ओषधि सभी प्रकारके विषकर्ममें हितकारी कही गयी है। | | एकवीर महौषध्यः शृणु चातः परं नृप॥ २२<br>वन्ध्या कर्कोटकी राजन् विष्णुकान्ता तथोत्कटा।<br>शतमूली सितानन्दा बला मोचा पटोलिका॥ २३ | सर्वोत्कृष्ट शूरवीर राजन्! इसके उपरान्त सर्वश्रेष्ठ ओषधियोंका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। राजन्! वन्ध्या, कर्कोटकी, विष्णुकान्ता, उत्कटा, शतमूली, सिता, आनन्दा, |