भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 888, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 888

८७८ * मत्स्यपुराण *


फलानाम्प्यपक्वानां पाकः क्षिप्रं प्रजायते।<br>प्रकोपश्चैव पक्वानां माल्यानां म्लानता तथा॥ २८<br>मृदुता कठिनानां स्यान्मृदूनां च विपर्ययः।<br>सूक्ष्माणां रूपदलनं तथा चैवातिरङ्गता॥ २९<br>श्याममण्डलता चैव वस्त्राणां वै तथैव च।<br>लौहानां च मणीनां च मलपङ्कोपदिग्धता॥ ३०<br>अनुलेपनगन्धानां माल्यानां च नृपोत्तम।<br>विगन्धता च विज्ञेया वर्णानां म्लानता तथा।<br>पीतावभासता ज्ञेया तथा राजन् जलस्य तु॥ ३१<br>दन्ता ओष्ठौ त्वचः श्यामास्तनुसत्त्वास्तथैव च।<br>एवमादीनि चिह्नानि विज्ञेयानि नृपोत्तम॥ ३२<br>तस्माद् राजा सदा तिष्ठेन् मणिमन्त्रौषधागदैः।<br>उक्तैः संरक्षितो राजा प्रमादपरिवर्जकः॥ ३३<br>प्रजातारोमूलमिहावनीश-<br>   स्तद्रक्षणाद् राष्ट्रमुपैति वृद्धिम्।<br>तस्मात् प्रयत्नेन नृपस्य रक्षा<br>   सर्वेण कार्या रविवंशचन्द्र॥ ३४लाल रंग हो जाता है। विषके संसर्गसे न पके हुए फल शीघ्र ही पक जाते हैं और पका हुआ फल विकृत हो जाता है। पुष्प-मालाएँ मलिन हो जाती हैं। कठोर वस्तु कोमल तथा कोमल वस्तु कठोर हो जाती है। सूक्ष्म वस्तुओंका रूप नष्ट हो जाता है और रंग बदल जाता है। वस्त्रोंमें विशेषकर काले धब्बे पड़ जाते हैं। लोहे और मणियोंपर मैल जम जाती है। नृपश्रेष्ठ! शरीरमें लेपन किये जानेवाले द्रव्यों एवं उपयोगमें आनेवाली पुष्प-मालाओंमें दुर्गन्धि तथा रंगकी मलिनता समझनी चाहिये। राजन्! उसी प्रकार जलमें भी पीलेपनका आभास आने लगता है। नृपोत्तम! विषके सेवनसे दाँत, होंठ और चमड़े श्यामल वर्णके हो जाते हैं और शरीरमें क्षीणताका अनुभव होने लगता है—इस प्रकार ये लक्षण जानने चाहिये। इसलिये राजाको सर्वदा मणि, मन्त्र और उपर्युक्त ओषधियोंसे सुरक्षित तथा सावधान रहना चाहिये। सूर्यवंशके चन्द्र! इस पृथ्वीपर प्रजारूपी वृक्षकी जड़ राजा है, अतः उसीकी रक्षासे राष्ट्रकी वृद्धि होती है। इसलिये सभीको प्रयत्नपूर्वक राजाकी रक्षा करनी चाहिये॥ २७–३४॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे राजरक्षा नामैकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें राजरक्षा नामक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१९॥


दो सौ बीसवाँ अध्याय

राजधर्म एवं सामान्य नीतिका वर्णन

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
राजन् पुत्रस्य रक्षा च कर्तव्या पृथिवीक्षिता।<br>आचार्यश्चात्र कर्तव्यो नित्ययुक्तश्च रक्षिभिः॥ १राजन्! राजाको अपने पुत्रकी रक्षा करनी चाहिये। उसकी शिक्षाके लिये पहरेदारोंकी देख-रेखमें एक ऐसे आचार्यकी नियुक्ति करनी चाहिये,
धर्मकामार्थशास्त्राणि धनुर्वेदं च शिक्षयेत्।<br>रथे च कुञ्जरे चैनं व्यायामं कारयेत् सदा॥ २जो उसे धर्म, काम एवं अर्थशास्त्र, धनुर्वेद तथा रथ एवं हाथीकी सवारीकी शिक्षा दे और सदा व्यायाम कराये। साथ ही उसे शिल्पकलाएँ भी सिखलाये। उसपर ऐसा प्रभाव पड़े कि वह गुरुजनोंके सम्मुख असत्य एवं अप्रिय बात न बोले। उसके शरीरकी रक्षाके व्याजसे रक्षक नियुक्त कर दे। इसे क्रोधी, लोभी और तिरस्कृत व्यक्तियोंकी संगतिमें नहीं जाने देना चाहिये। उसे इस प्रकार जितेन्द्रिय बनाना चाहिये कि जिससे वह युवावस्था आनेपर
शिल्पानि शिक्षयेच्चैनं नास्र्मिमिथ्याप्रियं वदेत्।<br>शरीररक्षाव्याजेन रक्षिणोऽस्य नियोजयेत्॥ ३
न चास्य सङ्गो दातव्यः क्रुद्धलुब्धावमानितैः।<br>तथा च विनयेदेनं यथा यौवनगोचरे॥ ४