मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय २२० * ८८१
| नैकस्तु मन्त्रयेन्मन्त्रं राजा न बहुभिः सह॥ ३७ | राजाको कभी केवल एक व्यक्तिके या एक ही साथ अनेक लोगोंके साथ मन्त्रणा नहीं करनी चाहिये। |
| नारोहेद् विषमां नावमपरीक्षितनाविकाम्।<br>ये चास्य भूमिजयिनो भवेयुः परिपन्थिनः॥ ३८ | राजा जिसकी परीक्षा न की गयी हो ऐसी विषम नौकापर सवार न हो। राजाके जो भूमिविजेता शत्रु हों, |
| तानानयेद् वशे सर्वान् सामादिभिरुपक्रमैः।<br>यथा न स्यात् कृशीभावः प्रजानामनवेक्षया॥ ३९ | उन सबको सामादि उपायोंद्वारा वशमें लाना चाहिये। अपने राष्ट्रकी रक्षामें तत्पर राजाका यह कर्तव्य है कि वह उपेक्षाके कारण प्रजाओंको दुर्बल न होने दे। |
| तथा राज्ञा प्रकर्तव्यं स्वराष्ट्रं परिरक्षता।<br>मोहाद् राजा स्वराष्ट्रं यः कर्षयत्यनवेक्षया॥ ४० | जो अज्ञानवश असावधानीसे अपने राष्ट्रको दुर्बल कर देता है, |
| सोऽचिराद् भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धवः।<br>भृतो वत्सो जातबलः कर्मयोग्यो यथा भवेत्॥ ४१ | वह शीघ्र ही भाई-बन्धुओंसहित राज्य एवं जीवनसे च्युत हो जाता है। महाभाग! जिस प्रकार पालतू बछड़ा बलवान् होनेपर कार्य करनेमें समर्थ होता है |
| तथा राष्ट्रं महाभाग भृतं कर्मसहं भवेत्।<br>यो राष्ट्रमनुगृह्णाति राज्यं स परिरक्षति॥ ४२ | उसी तरह पालन-पोषणकर समृद्ध किया हुआ राष्ट्र भी भविष्यमें कार्यक्षम हो जाता है। जो अपने राष्ट्रके ऊपर अनुग्रहकी दृष्टि रखता है, वस्तुतः वही राज्यकी रक्षा कर सकता है। |
| संजातमुपजीवेत् तु विन्दते स महत्फलम्।<br>राष्ट्राद्धिरण्यं धान्यं च महीं राजा सुरक्षिताम्॥ ४३ | जो उत्पन्न हुई प्रजाओंकी रक्षा करता है, वह महान् फलका भागी होता है। राजा राष्ट्रसे सुवर्ण, अन्न और सुरक्षित पृथ्वी प्राप्त करता है। |
| महता तु प्रयत्नेन स्वराष्ट्रस्य च रक्षिता।<br>नित्यं स्वेभ्यः परेभ्यश्च यथा माता यथा पिता॥ ४४ | माता और पिताके समान अपने राष्ट्रकी रक्षामें तत्पर रहनेवाला नृपति विशेष प्रयत्नसे नित्यप्रति स्वकीय एवं परकीय दोनों ओरसे होनेवाली बाधाओंसे अपने राष्ट्रकी रक्षा करे। |
| गोपितानि सदा कुर्यात् संयतानीन्द्रियाणि च।<br>अजस्रमुपयोक्तव्यं फलं तेभ्यस्तथैव च॥ ४५ | अपनी इन्द्रियोंको संयत तथा गुप्त रखे और सर्वदा उनका प्रयोग गोपनीय रूपसे करे, तभी उनसे उत्तम फल प्राप्त होता है। |
| सर्वं कर्मेदमायत्तं विधाने दैवमानुषे।<br>तयोर्दैवमचिन्त्यं च पौरुषे विद्यते क्रिया॥ ४६ | जीवनके सभी कार्य दैव और पौरुष—इन दोनोंके अधिकारमें रहते हैं। उन दोनोंमें दैव तो अचिन्त्य है, किंतु पौरुषमें क्रिया विद्यमान रहती है। |
| एवं महीं पालयतोऽस्य भर्तु-<br>र्लोकानुरागः परमो भवेत्।<br>लोकानुरागप्रभवा च लक्ष्मी-<br>र्लक्ष्मीवतश्चापि परा च कीर्तिः॥ ४७ | इस प्रकार पृथ्वीका पालन करनेवाले राजाके प्रति प्रजाका परम अनुराग हो जाता है। प्रजाके अनुरागसे राजाको लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है तथा लक्ष्मीवान् राजाको ही परम यशकी प्राप्ति होती है॥ ३७-४७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मानुकीर्तने विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजधर्मकीर्तन नामक दो सौ बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२०॥