मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय २२२ * ८८३
दो सौ बाईसवाँ अध्याय
साम-नीतिका वर्णन
| मनुरुवाच | मनुने पूछा— महान् द्युतिशील भगवन्! अब आप साम आदि उपायोंका वर्णन कीजिये। देवश्रेष्ठ! साथ ही उनका लक्षण और प्रयोग भी बतलाइये॥ १॥ |
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| उपायांस्त्वं समाचक्ष्व सामपूर्वान् महाद्युते।<br>लक्षणं च तथा तेषां प्रयोगं च सुरोत्तम॥ १ | |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— मनुजेश्वर! (राजनीतिमें) साम (स्तुति-प्रशंसा), भेद, दान, दण्ड, उपेक्षा, माया तथा इन्द्रजाल—ये सात प्रयोग बतलाये गये हैं। राजन्! उन्हें मैं बतला रहा हूँ, सुनिये! साम तथ्य और अतथ्यभेदसे दो प्रकारका कहा गया है। उनमें भी अतथ्य (झूठी प्रशंसा) साधु पुरुषोंकी अप्रसन्नताका ही कारण बन जाती है। नरोत्तम! इसलिये सज्जन व्यक्तिको प्रयत्नपूर्वक तथ्य साम (सच्ची प्रशंसा)-से वशमें करना चाहिये। जो उन्नत कुलमें उत्पन्न, सरलप्रकृति, धर्मपरायण और जितेन्द्रिय हैं, वे (तथ्य) सामसे ही साध्य होते हैं, अतः उनके प्रति अतथ्य सामका प्रयोग नहीं करना चाहिये। उनके प्रति तथ्य सामका प्रयोग, उनके कुल और शील-स्वभावका वर्णन, किये गये उपकारोंकी चर्चा तथा अपनी कृतज्ञताका कथन करना चाहिये। इसी युक्ति तथा इस प्रकारके सामसे धर्ममें तत्पर रहनेवालोंको अपने वशमें करना चाहिये। यद्यपि राक्षस भी साम-नीतिके द्वारा वशमें किये जाते हैं—ऐसी पराश्रुति है, तथापि असत्पुरुषोंके प्रति इसका प्रयोग उपकारी नहीं होता। दुर्जन पुरुष सामकी बातें करनेवालेको अतिशय डरा हुआ समझते हैं, इसलिये उनके प्रति इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। राजन्! जो पुरुष शुद्ध वंशमें उत्पन्न, सरलप्रकृतिवाले, विनम्र, धर्मिष्ठ, सत्यवादी, विनयी एवं सम्मानी हैं, वे ही निरन्तर सामद्वारा साध्य बतलाये गये हैं॥२—१०॥ |
| साम भेदस्तथा दानं दण्डश्च मनुजेश्वर।<br>उपेक्षा च तथा माया इन्द्रजालं च पार्थिव॥ २<br>प्रयोगाः कथिताः सप्त तन्मे निगदतः शृणु।<br>द्विविधं कथितं साम तथ्यं चातथ्यमेव च॥ ३<br>तत्राप्यतथ्यं साधूनामाक्रोशिवायैव जायते।<br>तत्र साधुः प्रयत्नेन सामसाध्यो नरोत्तम॥ ४<br>महाकुलीना ऋजवो धर्मनित्या जितेन्द्रियाः।<br>सामसाध्या न चातथ्यं तेषु साम प्रयोजयेत्॥ ५<br>तथ्यं साम च कर्तव्यं कुलशीलादिवर्णनम्।<br>तथा तदुपचाराणां कृतानां चैव वर्णनम्॥ ६<br>अनयैव तथा युक्त्या कृतज्ञाख्यापनं स्वकम्।<br>एवं साम्ना च कर्तव्या वशगा धर्मतत्पराः॥ ७<br>साम्ना यद्यपि रक्षांसि गृह्णन्तीति परा श्रुतिः।<br>तथाप्येतदसाधूनां प्रयुक्तं नोपकारकम्॥ ८<br>अतिशङ्कितमित्येवं पुरुषं सामवादिनम्।<br>असाधवो विजानन्ति तस्मात् तेषु वर्जयेत्॥ ९<br>ये शुद्धवंशा ऋजवः प्रणीता<br>धर्मे स्थिताः सत्यपरा विनीताः।<br>ते सामसाध्याः पुरुषाः प्रदिष्टा<br>मानोन्नता ये सततं च राजन्॥ १० |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे सामबोधो नाम द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें सामबोध नामक दो सौ बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२२॥