भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 903
* अध्याय २२७ *८९३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एताः स्त्रियस्तु भार्यार्थे नोपगच्छेत्तु बुद्धिमान्।<br>ज्ञातीनां च स्त्रियो यास्तु पतितानुगताश्च याः॥ ५१<br><br>अमानुषीषु पुरुषो उदक्यायामयोनिषु।<br>रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सांतपनं चरेत्॥ ५२<br><br>मैथुनं च समालोक्य पुंसि योषिति वा द्विजः।<br>गोयानेऽप्सु दिवा चैव सवासाः स्नानमाचरेत्॥ ५३<br><br>चाण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च।<br>पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात् साम्यं तु गच्छति॥ ५४<br><br>विप्रदुष्टां स्त्रियं भर्त्ता निरुन्ध्यादेकवेश्मनि।<br>यत् पुंसः परदारेषु तच्चैनां चारयेद् व्रतम्॥ ५५<br><br>सा चेत् पुनः प्रदुष्येत्तु सदृशेनोपमन्त्रिता।<br>कृच्छ्रं चान्द्रायणं चैव तत् तस्याः पावनं स्मृतम्॥ ५६<br><br>यः करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं द्विजः।<br>तद्भक्ष्यभुग् जपेन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति॥ ५७<br><br>एषा पापकृतामुक्ता चतुर्णामपि निष्कृतिः।<br>पतितैः सम्प्रयुक्तानामिमां शृणुत निष्कृतिम्॥ ५८बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि जो स्त्रियाँ अपनी जातिकी हों तथा जो पतितोंकी अनुगामिनी हों, उनके साथ भार्याके समान समागम न करे। मनुष्यसे भिन्न योनि, ऋतुमती स्त्री तथा योनिद्वारसे अन्यत्र अथवा जलमें वीर्यपात करके पुरुषको कृच्छ्र-सान्तपन नामक व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। बैलगाड़ीपर, जलमें तथा दिनमें स्त्री-पुरुषके मैथुनको देखकर ब्राह्मणको वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये। ब्राह्मण यदि अज्ञानसे चाण्डाल और अन्त्यज स्त्रियोंके साथ सम्भोग, उनके यहाँ भोजन और उनका दिया हुआ दान ग्रहण करता है तो वह पतित हो जाता है और जान-बूझकर करता है तो वह उन्हींके समान हो जाता है। ब्राह्मणद्वारा दूषित स्त्रीको उसका पति एक घरमें बंद कर दे। इसी प्रकार दूसरेकी स्त्रियोंसे समागम करनेवाले पुरुषको भी यही व्रत करना चाहिये। यदि वह स्त्री पुनः किसी परकीय पुरुषसे दूषित होती है तो उसे शुद्ध करनेके लिये कृच्छ्रचान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान बताया गया है। जो द्विज एक रात भी शूद्र स्त्रीके साथ समागम करता है तथा उसका दिया हुआ अन्न भोजन करता है, वह तीन वर्षांतक निरन्तर गायत्रीजप करनेसे शुद्ध होता है। चारों वर्णोंके पापियोंके लिये यह प्रायश्चित्त कहा गया है। अब पतितोंके संसर्गमें होनेवाले पापके लिये यह प्रायश्चित्त सुनिये॥ ५१—५८॥
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन्।<br>याजनाध्यापनाद् यौनादन्यानाशानासनात्॥ ५९<br><br>यो येन पतितेनैषां संसर्गं याति मानवः।<br>स तस्यैव व्रतं कुर्यात् तत्संसर्गविशुद्धये॥ ६०<br><br>पतितस्योदकं कार्यं सपिण्डैर्बान्धवैः सह।<br>निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञातिभिर्गुरुसंनिधौ॥ ६१<br><br>दासी घटमपां पूर्णं पर्यस्येत् प्रेतवत् सदा।<br>अहोरात्रमुपासीरन् नाशौचं बान्धवैः सह॥ ६२<br><br>निवर्त्तयेरंस्तस्मात्तु सम्भाषणसहासनम्।<br>दायादस्य प्रमाणं च यात्रामेव च लौकिकीम्॥ ६३<br><br>ज्येष्ठाभावान्निवर्तेत ज्येष्ठ्यावाप्तं च यत्पुनः।<br>ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान् गुणतोऽधिकः॥ ६४पतितके साथ यज्ञानुष्ठान, अध्यापन, यौन-सम्बन्ध, भोजन, एक वाहनपर गमन तथा आसनपर उपवेशन करनेसे भला मनुष्य (भी) एक वर्षमें पतित हो जाता है। जो मनुष्य इन कर्मोंमें जिस पतितका संसर्ग प्राप्त करता है, उसे उस संसर्गदोषकी शुद्धिके लिये उसी पतितके व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। उसके सपिण्ड भाई-बन्धुओंको जातिवालोंके साथ किसी निन्दित दिनको सायंकालके समय गुरुके समीप उस पतितके लिये उदक-क्रिया करनी चाहिये। दासी उक्त व्यक्तिके लिये प्रेतकी तरह जलपूर्ण घट रखे, परिवारवालोंके साथ एक दिन-रातका उपवास करे और अशौचके समान व्यवहार करे। परिवारवालोंके लिये उसके साथ वार्तालाप करना और एक आसनपर बैठना निषिद्ध है। इस पाप-कर्मकी जातिको भी उन्हें नहीं प्रकट करना चाहिये—यह लोककी मर्यादा है। जिस प्रकार ज्येष्ठ भाईके न रहनेपर उसके हिस्सेकी प्राप्ति छोटे भाईको होती है, उसी प्रकार अधिक गुणवान् होनेपर भी छोटे भाईको उसका फल भोगना पड़ता है।