भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८९६ * मत्स्यपुराण *

वृक्षं तु सफलं छित्त्वा सुवर्णं दण्डमर्हति।<br>द्विगुणं दण्डयेच्चैनं पथि सीम्नि जलाशये॥ ९१<br><br>छेदनादफलस्यापि मध्यमं साहसं स्मृतम्।<br>गुल्मवल्लीलतानां च सुवर्णस्य च माषकम्॥ ९२<br><br>वृथाच्छेदी तृणस्यापि दण्ड्यः कार्षापणं भवेत्।<br>त्रिभागं कृष्णला दण्ड्याः प्राणिनस्ताडने तथा॥ ९३<br><br>देशकालानुरूपेण मूल्यं राजा द्रुमादिषु।<br>तत्स्वामिनस्तथा दण्ड्या दण्डमुक्तस्तु पार्थिव ॥ ९४<br><br>यत्रातिवर्तते युग्यं वैगुण्यात् प्राजकस्य तु।<br>तत्र स्वामी भवेद् दण्ड्यो नाप्तश्चेत् प्राजको भवेत्॥ ९५<br><br>प्राजकश्च भवेदाप्तः प्राजको दण्डमर्हति।<br>नास्ति दण्डश्च तस्यापि तथा वै हेतुकल्पकः॥ ९६<br><br>द्रव्याणि यो हरेद् यस्य ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा।<br>स तस्योत्पादयेत् तुष्टिं राज्ञो दद्यात् ततो दमम्॥ ९७<br><br>यस्तु रज्जुं घटं कूपाद्धरेद् भिन्द्याच्च तां प्रपाम्।<br>स दण्डं प्राप्नुयान्माषं तच्च सम्प्रतिपादयेत्॥ ९८<br><br>धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः।<br>शेषेऽप्येकादशगुणं तस्य दण्डं प्रकल्पयेत्॥ ९९<br><br>तथा भक्ष्यान्नपानानां न तथाप्यधिके वधः।<br>सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां न वाससाम्॥ १००<br><br>पुरुषाणां कुलीनानां नारीणां च विशेषतः।<br>महापशूनां हरणे शस्त्राणामौषधस्य च॥ १०१<br><br>मुख्यानां चैव रत्नानां हरणे वधमर्हति।दण्डको बतला रहा हूँ। फलयुक्त वृक्षको काटनेपर अपराधीको सुवर्णका दण्ड देना उचित है। यदि वह वृक्ष किसी सीमा, मार्ग अथवा जलाशयके समीप है तो उसे दुगुना दण्ड देना चाहिये। फलरहित वृक्षको भी काटनेपर मध्यमसाहसका दण्ड देनेका विधान है। गुल्मों, लताओं तथा वल्लियोंको काटनेपर एक मासा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। बिना किसी आवश्यकताके तृणको भी नष्ट करनेवाला व्यक्ति एक कार्षापणके दण्डका भागी होता है। किसी प्राणीको कष्ट पहुँचानेवालेको कृष्णलके तिहाई भागका दण्ड देना चाहिये। राजन्! वृक्षादिके काटे जानेपर राजा देश तथा कालके अनुसार उचित मूल्यका दण्ड दे और उस दण्डको वृक्षादिके स्वामीको दिला दे। यदि चालककी असावधानीसे रथ मार्गसे विचलित हो जाता है तो ऐसे अवसरपर यदि वह चालक निपुण नहीं है तो उसके स्वामीको दण्ड देना चाहिये और यदि चालक निपुण है तो उसीके ऊपर दण्ड लगाना चाहिये, किंतु यदि वह घटना किसी विशेष परिस्थितिवश घटित हुई हो तो चालकको भी दण्ड नहीं देना चाहिये। जो किसीके द्रव्यको जानकर या अनजानमें अपहरण कर लेता है, उसे राजाके सम्मुख दण्ड स्वीकार कर उसके स्वामीको संतुष्ट करना चाहिये। अन्यथा उसपर एक पण दण्ड लगानेका विधान है। जो व्यक्ति किसी कुएँपरसे रस्सी अथवा घड़ा चुरा लेता है या उस कुएँको तोड़ता-फोड़ता है, उसके ऊपर एक मासा सुवर्णका दण्ड लगाना उचित है और उसीसे कुएँकी क्षति-पूर्ति करानी चाहिये। दस घड़ेसे अधिक अन्न चुरानेवालेको प्राण-दण्ड देना चाहिये। यदि दस घड़ेसे कम अन्न चुराता है तो उसने जितना अन्न चुराया है, उससे ग्यारहगुना अधिक मूल्यका दण्ड उसपर लगाना चाहिये। उसी प्रकार दस घड़ेसे अधिक खाद्य-सामग्री, अन्न एवं पानादिकी चोरी करनेपर उसी प्रकारके दण्डका विधान है। उसे प्राणदण्ड नहीं देना चाहिये। सुवर्ण, चाँदी आदि धातुओं, उत्तम वस्त्रों, कुलीन पुरुषों, विशेषतया कुलीन स्त्रियों, बड़े-बड़े पशुओं, हथियारों, औषधियों तथा मुख्य-मुख्य रत्नोंकी चोरी करनेपर चोर प्राण-दण्डका पात्र होता है॥ ९०—१०१ १/२॥
दध्नः क्षीरस्य तक्रस्य पानीयस्य रसस्य च॥ १०२<br><br>वेणुवैदलभाण्डानां लवणानां तथैव च।<br>मृन्मयानां च सर्वेषां मृदो भस्मन एव च॥ १०३दही, दूध, तक्र (छाँछ-मट्ठा), जल, रस, बाँस एवं वैदल आदिके पात्र, लवण, सभी प्रकारके मिट्टीके पात्र, मिट्टी और भस्मकी चोरी करनेवालेके लिये राजा