मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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८९८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एते हि कथिता लोके धर्मज्ञैराततायिनः ।<br>भिक्षुकोऽप्यथवा नारी योऽपि वा स्यात् कुशीलवः ॥ ११९<br>प्रविशेत् प्रतिषिद्धस्तु प्राप्नुयाद् द्विगुणं दमः ।<br>परस्त्रीणां तु सम्भाषे तीर्थेऽरण्ये गृहेऽपि वा ॥ १२०<br>नदीनां चैव सम्भेदे स संग्रहणमाप्नुयात् ।<br>न सम्भाषेत् परस्त्रीभिः प्रतिषिद्धः समाचरेत् ॥ १२१<br>प्रतिषिद्धे समाभाष्य सुवर्णं दण्डमर्हति ।<br>नैव चारणदारेषु विधिरात्मोपजीविषु ॥ १२२<br>सज्जयन्ति मनुष्यैस्ता निगूढं वा चरन्त्युत ।<br>किंचिदेव तु दाप्यः स्यात् सम्भाषेणापचारयन् ॥ १२३<br>प्रेष्यासु चैव सर्वासु गृहप्रव्रजितासु च ।<br>योऽकामां दूषयेत् कन्यां स सद्यो वधमर्हति ॥ १२४<br>सकामां दूषयाणस्तु प्राप्नुयाद् द्विशतं दमम् ।<br>यश्च संरक्षकस्तत्र पुरुषः स तथा भवेत् ॥ १२५ | इनको धर्मज्ञोंने लोकमें आततायी बतलाया है। यदि भिक्षुक, परायी स्त्री तथा चारण आदि निषेध करनेपर भी घरमें घुस जाते हैं तो उन्हें दुगुना दण्ड देना चाहिये। तीर्थ, जंगल या घरमें परायी स्त्रियोंके साथ वार्तालाप करनेवाले तथा नदीकी धाराका भेदन करनेवालेको पकड़कर बंद कर देना चाहिये। 'परायी स्त्रीके साथ सम्भाषण नहीं करना चाहिये'—ऐसी निषेधाज्ञा घोषित कर दे। निषेध होनेपर भी यदि कोई सम्भाषण करता है तो वह एक सुवर्ण-मुद्राके दण्डका भागी होता है। किंतु यह दण्ड चारणों, स्त्रियों तथा अन्तःपुरमें प्रवेश कर नृत्य-गीतादिद्वारा अपनी जीविका चलानेवालेको नहीं देना चाहिये। ऐसे लोग यदि अन्तःपुरके लोगोंके साथ सम्भाषण करते हैं या वहाँ घूमते-फिरते हैं तो उन्हें तथा घरसे निकालकर बाहर घूमती हुई सभी दासियोंको नाममात्रका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति किसी कुमारी कन्याके साथ बलात्कार करता है, वह तुरंत ही मार डालने योग्य है। यदि कोई किसी कामुकी कुमारी कन्याके साथ व्यभिचार करता है तो उसे दो सौ पणका दण्ड देना चाहिये और वहाँ जो संरक्षणकर्ता पुरुष है, उसे भी यही दण्ड देना चाहिये॥ ११९—१२५॥ |
| पारदारिकवद् दण्ड्यो योऽपि स्यादवकाशदः ।<br>बलात् संदूषयेद् यस्तु परभार्यां नरः क्वचित् ॥ १२६<br>वधो दण्डो भवेत्तस्य नापराधो भवेत् स्त्रियाः ।<br>रजस्तृतीयां या कन्या स्वगृहे प्रतिपद्यते ॥ १२७<br>अदण्ड्या सा भवेद् राज्ञा वरयन्ती पतिं स्वयम् ।<br>स्वदेशे कन्यकां दत्त्वा तामादाय तथा व्रजेत् ॥ १२८<br>परदेशे भवेद् वध्यः स्त्रीचौरः स यतो भवेत् ।<br>अद्रव्यां मृतपत्नीं तु संगृह्णन्नापराध्यति ॥ १२९<br>सद्रव्यां तां संगृहीता दण्डं तु क्षिप्रमर्हति ।<br>उत्कृष्टं या भजेत् कन्या देया तस्यैव सा भवेत् ॥ १३०<br>यच्चान्यं सेवमानां च संयतां वासयेद् गृहे ।<br>उत्तमां सेवमानस्तु जघन्यो वधमर्हति ।<br>जघन्यमुत्तमा नारी सेवमाना तथैव च ॥ १३१ | जो ऐसे व्यभिचारोंको सम्भव बनानेमें अवकाश देता है, उसे परायी स्त्रीके साथ व्यभिचार करनेवालेके समान ही दण्ड देना चाहिये। जो मनुष्य दूसरेकी स्त्रीके साथ बलात्कार करता है, उसे प्राणदण्ड देना चाहिये और इसमें उस स्त्रीका कोई भी अपराध नहीं मानना चाहिये। जो कन्या पिताके घरपर तीसरी बार रजस्वला होकर स्वयं पतिका वरण कर लेती है, वह राजाद्वारा दण्डनीय नहीं होती। जो अपने देशमें कन्यादान देकर पुनः उसे लेकर परदेशमें भाग जाता है, उसे प्राणदण्ड देना चाहिये; क्योंकि वह स्त्री-चोर है। द्रव्यहीना, विधवा स्त्रीको ग्रहण करनेवाला अपराधी नहीं माना जाता, किंतु सम्पत्तिसहित विधवाको स्वीकार करनेवाला शीघ्र ही दण्डका भागी होता है। जो कन्या अपनी जाति अथवा योग्यतासे उत्कृष्ट व्यक्तिसे प्रेम करती है तो उसे उसी व्यक्तिको दे देना चाहिये, किंतु जो कन्या किसी कम योग्यतावालेसे प्रेम करती है, उसे विशेष संयमके साथ घरमें ही रखे। यदि नीच जातिवाला जघन्य पुरुष उत्तम जातिकी कन्याके साथ प्रेम करता है तो उसे प्राण-दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार यदि उत्तम जातिकी स्त्री किसी नीच जातिके पुरुषके साथ प्रेम करती है तो वह भी प्राण-दण्डके योग्य है। |