मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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९०४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तुलाशासनमानानां कूटकृन्मानकस्य च।<br>एभिश्च व्यवहर्ता च स दण्ड्यो दममुत्तमम्॥ १९८<br><br>विषाग्निदां पतिगुरुनिजापत्यप्रमापणीम्।<br>विकर्णनासिकां व्योष्ठीं कृत्वा गोभिः प्रमापयेत्॥ १९९<br><br>ग्रामस्य दाहका ये च ये च क्षेत्रस्य वेश्मनः।<br>राजपत्यभिगामी च दग्धव्यास्ते कटाग्निना॥ २००<br><br>ऊनं वाप्यधिकं चापि लिखेद् यो राजशासनम्।<br>पारदारिकचौरं वा मुञ्चतो दण्ड उत्तमः॥ २०१<br><br>अभक्ष्येण द्विजं दूष्य दण्ड्य उत्तमसाहसम्।<br>क्षत्रियं मध्यमं वैश्यं प्रथमं शूद्रमर्धकम्॥ २०२<br><br>मृताङ्गलग्नविक्रेतुर्गुरुं ताडयतस्तथा।<br>राजयानासनारोढुर्दण्ड उत्तमसाहसः॥ २०३<br><br>यो मन्येताजितोऽस्मीति न्यायेनापि पराजितः।<br>तमायान्तं पुनर्जित्वा दण्डयेद् द्विगुणं दमम्॥ २०४<br><br>आह्वानकारी मध्यः स्यादनाह्वाने तथाह्वयन्।<br>दण्डिकस्य च यो हस्तादभियुक्तः पलायते॥ २०५<br><br>हीनः पुरुषकारेण तं दण्ड्याद् दाण्डिको धनम्।<br>प्रेष्यापराधात् प्रेष्यस्तु स दण्ड्यश्चार्धमेव च॥ २०६<br><br>दण्डार्थं नियमार्थं च नीयमानेषु बन्धनम्।<br>यदि कश्चित् पलायेत दण्डश्चाष्टगुणो भवेत्॥ २०७<br><br>अनिन्दिते विवादे तु नखरोमावतारणम्।<br>कारयेद् यः स पुरुषो मध्यमं दण्डमर्हति॥ २०८ | तराजू, शासन, मानदण्ड और धर्मकाँटेके प्रति कूटनीतिका प्रयोग करनेवाले तथा ऐसे व्यक्तिके साथ व्यवहार करनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। विष देनेवाली, आग लगानेवाली, पति, गुरुजन एवं अपने बच्चोंकी हत्या करनेवाली स्त्रीको कान, ओष्ठ और नाकसे रहित करके पशुओंद्वारा मरवा डालना चाहिये। जो गाँव, खेत और घरमें आग लगानेवाले तथा राजपत्नीके साथ व्यभिचार करनेवाले हैं, उन्हें घास-फूसकी अग्निमें जला देना चाहिये। जो (राजाका अधिकारी) राजाज्ञाको घटा-बढ़ाकर लिखता है तथा दूसरेकी स्त्रीके साथ अपराध करनेवाले एवं चोरको छोड़ देता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति अभक्ष्य वस्तु खिलाकर ब्राह्मणको दूषित करता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। इसी प्रकार क्षत्रियको विधर्मी करनेवालेको मध्यम, वैश्यको प्रथम तथा शूद्रको अर्धसाहसका दण्ड देना चाहिये। मृतकके शरीरपर लगे हुए आभूषण तथा वस्त्रादिको बेंचनेवाले, गुरुको पीटनेवाले, राजाके वाहन और आसनपर बैठनेवालेको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति न्यायद्वारा या युद्धमें पराजित होनेपर भी अपनेको 'मैं पराजित नहीं हूँ'-ऐसा मानता है, उसे आता हुआ देखकर राजाको चाहिये कि उसे पुनः जीतकर दुगुने पणका दण्ड दे। जो व्यक्ति अपराध होनेपर सूचनाद्वारा बुलानेसे नहीं आता है और जो बिना बुलाये ही आकर सम्मुख उपस्थित होता है तथा जो अपराधी दण्ड देनेवालेके हाथसे छुड़ाकर भाग जाता है-ऐसे हीन लोगोंको पौरुषपूर्वक दण्ड देनेवाला न्यायकर्ता आर्थिक दण्ड दे। जो व्यक्ति दूत होनेपर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उसे उपर्युक्त दण्डका आधा दण्ड देना चाहिये। दण्ड या नियमनके लिये बाँधकर ले जाते समय यदि कोई अपराधी भाग जाता है तो उसे आठगुना दण्ड देना चाहिये। जो पुरुष सामान्य वाद-विवादमें किसीके नख या बालको काट लेता है, वह मध्यम दण्डका भागी होता है॥ १९८-२०८॥ |
| बन्धनं चाप्यवध्यस्य बलान्मोचयते तु यः।<br>वध्यं विमोचयेद् यस्तु दण्ड्यो द्विगुणभाग् भवेत्॥ २०९<br><br>दुर्द्दृष्टव्यवहाराणां सभ्यानां द्विगुणो दमः।<br>राज्ञा त्रिंशद्गुणो दण्डः प्रक्षेप्य उदके भवेत्॥ २१० | जो व्यक्ति बलपूर्वक अवध्य अपराधीके बन्धनोंको खोल देता है तथा जो मृत्यु-दण्डके अपराधीको छोड़ देता है, वह दुगुने दण्डका भागी होता है। राजाके जो सभासद उपस्थित विषयोंमें कुशलतासे मनोयोग नहीं देते, उन्हें दूना दण्ड देना चाहिये। राजा ऐसे अपराधियोंको तीसगुना अधिक दण्ड दे और जलमें फेंकवा दे। |