भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 919
* अध्याय २२९ *९०९
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
त्रिभिर्वर्षैस्तथा ज्ञेयं सुमहद्भयकारकम्।<br>राज्ञः शरीरे लोके च पुरद्वारे पुरोहिते॥ १२<br>पाकमायाति पुत्रेषु तथा वै कोशवाहने।<br>ऋतुस्वभावाद् राजेन्द्र भवन्त्यद्भुतसंज्ञिताः॥ १३<br>शुभावहास्ते विज्ञेयास्तांश्च मे गदतः शृणु।इसे तीन वर्षोंतक महान् भयदायक मानना चाहिये। इसका परिणाम राजाके शरीर, राज्य, पुरद्वार, पुरोहित, पुत्र, कोश और वाहनोंपर प्रकट होता है। राजेन्द्र! जो अद्भुतसंज्ञक उत्पात ऋतुओंके स्वभावके अनुकूल होते हैं, उन्हें शुभदायक मानना चाहिये। मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये॥ ५—१३ १/२ ॥
वज्राशनिमहीकम्पसंध्यानिर्घातनिःस्वनाः॥ १४<br>परिवेषरजोधूम्ररक्ताकार्कस्तमयोदयाः ।<br>द्रुमोद्भेदकरस्नेहो बहुशः सफलद्रुमः॥ १५<br>गोपक्षिमधुवृद्धिश्च शुभानि मधुमाधवे।वज्र एवं बिजलीका गिरना, पृथ्वीका कम्पन, संध्याके समय वज्रका शब्द, सूर्य तथा चन्द्रमामें मण्डलोंका होना, धूलि और धूएँका उद्भव, उदय एवं अस्तके समय सूर्यकी अतिलालिमा, वृक्षोंके टूट जानेपर उनसे रसका गिरना, फलवाले वृक्षोंकी अधिकता, गौ, पक्षी और मधुकी वृद्धि—ये चैत्र और वैशाखमासमें शुभप्रद हैं।
ऋक्षोल्कापातकलुषं कपिलार्केन्दुमण्डलम्॥ १६<br>कृष्णश्वेतं तथा पीतं धूसरध्वान्तलोहितम्।<br>रक्तपुष्पारुणं सांध्यं नभः क्षुब्धार्णवोपमम्॥ १७<br>सरितां चाम्बुसंशोषं दृष्ट्वा ग्रीष्मे शुभं वदेत्।ग्रीष्म ऋतुमें कलुषित नक्षत्रों और ग्रहोंका पतन, सूर्य और चन्द्रके मण्डलोंका कपिल वर्ण होना, सायंकालीन नभके काले और सफेद मिश्रित, पीले, धूसरित, श्यामल, लाल, लाल पुष्पके समान अरुण और क्षुब्ध सागरकी तरह संक्षुब्ध होना तथा नदियोंका जल सूख जाना—इन उत्पातोंको देखकर इन्हें शुभ कहना चाहिये।
शक्रायुधपरीवेषं विद्युदुल्काधिरोहणम्॥ १८<br>कम्पोद्धर्तनवैकृत्यं हसनं दारणं क्षितेः।<br>नद्युदपानसरसां विधूनतरणप्लवाः॥ १९<br>शृङ्गिणां च वराहाणां वर्षासु शुभमिष्यते।इन्द्रधनुषका मण्डलाकार उदय, विद्युत् और उल्काका पतन, पृथ्वीका अकस्मात् कम्पन, उलट-पलट विकृति, हास और फटना, नदियों एवं तालाबोंमें जलकी न्यूनता, नाव, जहाज और पुलका काँपना, सींगवाले जानवरों तथा शूकरोंकी वृद्धि—ये उत्पात वर्षा ऋतुमें मङ्गलकारी हैं।
शीतानिलतुषारत्वं नर्दनं मृगपक्षिणाम्॥ २०<br>रक्षोभूतपिशाचानां दर्शनं वागमानुषी।<br>दिशो धूमान्धकाराश्च सनभोवनपर्वताः॥ २१<br>उच्चैः सूर्योदयास्तौ च हेमन्ते शोभनाः स्मृताः।शीतल वायु, तुषार, पशु एवं पक्षियोंका चीत्कार, राक्षस, भूत और पिशाचोंका दर्शन, दैवी वाणी, सूर्यके उदय-अस्तके समय आकाश, वन और पर्वतोंसहित दिशाओंका गाढ़रूपमें धूएँसे अन्धकारित हो जाना—ये उत्पात हेमन्त-ऋतुमें उत्तम माने जाते हैं।
दिव्यस्त्रीरूपगन्धर्वविमानाद्भुतदर्शनम् ॥ २२<br>ग्रहनक्षत्रताराणां दर्शनं वागमानुषी।<br>गीतवादित्रनिर्घोषो वनपर्वतसानुषु॥ २३<br>सस्यवृद्धी रसोत्पत्तिः शरत्काले शुभाः स्मृताः।दिव्य स्त्रीका रूप, गन्धर्व-विमान, ग्रह, नक्षत्र और ताराओंका दर्शन, दैवी वाणी, वनोंमें और पर्वतोंकी चोटियोंपर गाने-बजानेका शब्द सुनायी पड़ना, अन्नोंकी वृद्धि, रसकी विशेष उत्पत्ति—ये उत्पात शरत्कालमें माङ्गलिक कहे गये हैं।
हिमपातानिलोत्पातविरूपादभुतदर्शनम् ॥ २४<br>कृष्णाञ्जनाभमाकाशं तारोल्कापातपिञ्जरम्।<br>चित्रगर्भोद्भवः स्त्रीषु गोऽजाश्वमृगपक्षिषु।<br>पत्राङ्कुरलतानां च विकाराः शिशिरे शुभाः॥ २५हिमपात, वातका बहना, विरूप एवं अद्भुत उत्पातोंका दर्शन, आकाशका काले कज्जलके समान दिखायी पड़ना तथा ताराओं एवं उल्काओंके गिरनेसे पीले रंगका दीख पड़ना, स्त्री, गाय, बकरी, घोड़ी, मृगी और पक्षियोंसे विचित्र प्रकारके बच्चोंका पैदा होना, पत्तों, अङ्कुरों और लताओंमें अनेकों प्रकारके