भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 928
९१८* मत्स्यपुराण *

| मृगपक्षिविकारेषु कुर्याद्धोमं सदक्षिणम्।<br>देवाः कपोता इति वा जप्तव्याः पञ्चभिर्द्विजैः ॥ १३<br>गावश्च देया विधिवद् द्विजानां<br>सकाञ्चना वस्त्रयुगोत्तरीयाः ।<br>एवं कृते शान्तिमुपैति पापं<br>मृगैर्द्विजैर्वा विनिवेदितं यत् ॥ १४ | इस प्रकार पशु-पक्षीसम्बन्धी उत्पातोंके होनेपर दक्षिणासहित हवन करना चाहिये या पाँच ब्राह्मणोंको ‘देवाः कपोता’—इस मन्त्रका जप करना चाहिये। ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक सुवर्ण तथा दुपट्टेसहित दो वस्त्रोंसे युक्त गौओंका दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे पशुओं एवं पक्षियोंद्वारा सूचित किया गया पाप शान्त हो जाता है॥ ९—१४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तौ मृगपक्षिवैकृत्यं नाम सप्तत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुतशान्ति-प्रसंगमें पशु-पक्षी-विकार-शान्ति नामक दो सौ सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३७॥


दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय

राजाकी मृत्यु तथा देशके विनाशसूचक लक्षण और उनकी शान्ति

गर्ग उवाचगर्गजीने कहा—
प्रासादतोरणाट्टालद्वारप्राकारवेश्मनाम् ।<br>निर्निमित्तं तु पतनं दृढानां राजमृत्युवे ॥ १ब्रह्मन्! सुदृढ़ राजभवन, तोरण, अट्टालिका, प्रवेशद्वार, परकोटा और घरका अकारण गिरना राजाकी मृत्युका कारण होता है।
रजसा वाथ धूमेन दिशो यत्र समाकुलाः ।<br>आदित्यचन्द्रताराश्च विवर्णा भयवृद्धये ॥ २जहाँ दिशाएँ धूलि अथवा धूएँसे व्याप्त दिखायी पड़ती हैं तथा सूर्य, चन्द्रमा और ताराओंका रंग बदल जाता है तो यह भी भय-वृद्धिका सूचक है।
राक्षसा यत्र दृश्यन्ते ब्राह्मणाश्च विधर्मिणः ।<br>ऋतवश्च विपर्यस्ता अपूज्यः पूज्यते जनैः ॥ ३जहाँ राक्षस दिखायी पड़ते हों, ब्राह्मण विधर्मी हों, ऋतुओंका विपर्यय हो, लोग अपूज्यकी पूजा करते हों
नक्षत्राणि वियोगीनि तन्महद्भयलक्षणम् ।<br>केतूदयोपरागो च छिद्रं वा शशिसूर्ययोः ॥ ४और नक्षत्रगण आकाशसे नीचे गिरने लगें तो यह महान् भयका लक्षण है। जहाँ केतुका उदय, ग्रहण, चन्द्र-सूर्यके बिम्बमें छिद्र
ग्रहर्क्षविकृतिर्यत्र तत्रापि भयमादिशेत् ।<br>स्त्रियश्च कलहायन्ते बाला निघ्नन्ति बालकान् ॥ ५तथा ग्रह और नक्षत्रोंमें विकार दिखायी दे, वहाँ भी भयकी सम्भावना कहनी चाहिये। जहाँ स्त्रियाँ आपसमें झगड़ने लगें, बालक बच्चोंको मारने लगें,
क्रियाणामुचितानां च विच्छित्तिर्यत्र जायते ।<br>हूयमानस्तु यत्राग्निर्नोद्दीप्यते न च शान्तिषु ॥ ६उचित कार्योंका विनाश होने लगे, शान्तिकर्मोंमें आहुति देनेपर भी अग्नि उद्दीप्त न हो,
पिपीलिकाश्च क्रव्यादा यान्ति चोत्तरतस्तथा ।<br>पूर्णकुम्भाः स्रवन्ते च हविर्वा विप्रलुप्यते ॥ ७पिपीलिका और मांसभक्षी पक्षी उत्तर दिशा होकर जायें, भरे हुए घटोंमें रखी हुई वस्तुओंका चूना, हविका नष्ट हो जाना,
मङ्गल्याश्च गिरो यत्र न श्रूयन्ते समंततः ।<br>क्षवथुर्बाधते वाथ प्रहसन्ति नदन्ति च ॥ ८चारों ओरसे माङ्गलिक वाणियोंका न सुना जाना, लोगोंमें कास-रोगकी पीड़ा, जनतामें अकारण हँसी और गानेकी अभिरुचि,
न च देवेषु वर्तन्ते यथावद् ब्राह्मणेषु च ।<br>मन्दघोषाणि वाद्यानि वाद्यन्ते विस्वराणि च ॥ ९देवता और ब्राह्मणोंके प्रति उचित बर्तावका अभाव, बाजोंका मन्द एवं विकृत स्वरमें बजना,
गुरुमित्रद्विषो यत्र शत्रुपूजारता नराः ।<br>ब्राह्मणान् सुहृदो मान्यान् जनो यत्रावमन्यते ॥ १०लोगोंमें गुरु एवं मित्रोंसे द्वेष तथा शत्रु की पूजामें अभिरुचि, ब्राह्मण, मित्र और माननीय लोगोंका अपमान तथा