भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९२० * मत्स्यपुराण *


| सुसमे भूमिभागे च दैवज्ञाधिष्ठितो नृपः।<br>गुरुणा चैव ऋत्विग्भिः सार्धं भूमिं परीक्षयेत्॥ ५<br>खनेत् कुण्डं च तत्रैव सुसमं हस्तमात्रकम्।<br>द्विगुणं लक्षहोमे तु कोटिहोमे चतुर्गुणम्॥ ६<br>युग्मास्तु ऋत्विजः प्रोक्ता अष्टौ वै वेदपारगाः।<br>कन्दमूलफलाहारा दधिक्षीराशिनोऽपि वा॥ ७<br>वेद्यां निधापयेच्चैव रत्नानि विविधानि च।<br>सिकतापरिवेषान्च ततोऽग्निं च समिन्धयेत्॥ ८<br>गायत्र्या दशसाहस्रं मानस्तोकेन षड्गुणः।<br>त्रिंशद् ग्रहाणां मन्त्रैश्च चत्वारो विष्णुदैवतैः॥ ९<br>कूष्माण्डैर्जुहुयात् पञ्च कुसुमाद्यैस्तु षोडश।<br>होतव्या दशसाहस्रं बादरैर्जातवेदसि॥ १०<br>श्रियो मन्त्रेण होतव्याः सहस्राणि चतुर्दश।<br>शेषाः पञ्चसहस्त्रास्तु होतव्यास्त्विन्द्रदैवतैः॥ ११<br>हुत्वा शतसहस्रं तु पुण्यस्नानं समाचरेत्।<br>कुम्भैः षोडशसंख्यैश्च सहिरण्यैः सुमङ्गलैः॥ १२<br>स्नापयेद् यजमानं तु ततः शान्तिर्भविष्यति।<br>एवं कृते तु यत्किंचिद् ग्रहपीडासमुद्भवम्॥ १३<br>तत् सर्वं नाशमायाति दत्त्वा वै दक्षिणां नृप।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन प्रधाना दक्षिणा स्मृता॥ १४<br>हस्त्यश्वरथयानानि भूमिवस्त्रयुगानि च।<br>अनुडुद्गोशतं दद्याद् ऋत्विग्जां चैव दक्षिणाम्॥ १५<br>यथाविभवसारं तु वित्तशाठ्यं न कारयेत्।<br>मासे पूर्णे समाप्तस्तु लक्षहोमो नराधिप॥ १६<br>लक्षहोमस्य राजेन्द्र विधानं परिकीर्तितम्।<br>इदानीं कोटिहोमस्य शृणु त्वं कथयाम्यहम्॥ १७<br>गङ्गातटेऽथ यमुनासरस्वत्योर्न्ररेश्वर।<br>नर्मदादेविकायास्तु तटे होमो विधीयते॥ १८<br>तत्रापि ऋत्विजः कार्या रविनन्दन षोडश।<br>सर्वहोमे तु राजर्षे दद्याद् विप्रेऽथवा धनम्॥ १९<br>ऋत्विगाचार्यसहितो दीक्षां सांवत्सरीं स्थितः।<br>चैत्रे मासे तु सम्प्राप्ते कार्त्तिके वा विशेषतः॥ २०<br>प्रारम्भः करणीयो वा वत्सरं वत्सरं नृप। | समतल भूभागपर करना चाहिये। सर्वप्रथम राजा ज्योतिषीसे परामर्श कर गुरु और ऋत्विजोंके साथ भूमिकी परीक्षा करे। वहाँ एक हाथ गहरा चौकोर कुण्ड बनाये। लक्षहोममें यह कुण्ड दुगुना और कोटिहोममें चौगुना बड़ा बनाना चाहिये। इसके लिये सोलह ऋत्विज् बतलाये गये हैं, जो वेदोंके पारगामी विद्वान् कंद-मूल-फलका आहार करनेवाले अथवा दही-दूधका भोजन करनेवाले हों। यजमान राजा यज्ञवेदीपर विविध प्रकारके रत्न स्थापित करे। बालूद्वारा वेदीके चारों ओर मण्डल बनाकर अग्नि प्रज्वलित कराये। फिर गायत्रीमन्त्रद्वारा दस हजार, 'मानस्तोके०' (ऋ० ३।१३।६, वाजसनेयि १६।१६) आदि मन्त्रद्वारा छः हजार, ग्रहोंके मन्त्रोंसे तीस हजार, विष्णुसूक्तसे चार हजार, कोंहड़ेसे पाँच हजार, पुष्प-समूहसे सोलह हजार तथा बेरके फलोंसे दस हजार आहुतियाँ अग्निमें देनी चाहिये॥ ३-१०॥<br><br>इसी प्रकार श्रीसूक्तसे चौदह हजार आहुतियाँ देनी चाहिये और शेष पाँच हजार आहुतियाँ इन्द्र देवताके मन्त्रोंसे देनी चाहिये। फिर एक लाख आहुतियोंसे हवन कर पुण्यस्नान* सम्पन्न करे। तत्पश्चात् सुवर्णयुक्त सोलह मङ्गल-कलशोंसे यजमानको स्नान कराये, तब शान्तिकी प्राप्ति होती है। नृप! ऐसा करके दक्षिणा देनेपर ग्रहपीडासे उत्पन्न जो कुछ कष्ट होता है, वह सब नष्ट हो जाता है। इसीलिये सभी प्रकारसे दक्षिणाको ही प्रधान माना गया है। उस समय राजा अपनी सम्पत्तिके अनुकूल ऋत्विजोंको हाथी, घोड़े, रथ, वाहन, भूमि, जोड़े वस्त्र, बैल तथा सौ गौएँ दक्षिणारूपमें दे, कृपणता न करे। नराधिप! लक्षहोम एक मासमें समाप्त होता है। राजेन्द्र! इस प्रकार मैंने लक्षहोमका विधान आपको बतला दिया। अब मैं कोटिहोमका विधान बतला रहा हूँ, आप सुनिये। नरेश्वर! गङ्गा, यमुना और सरस्वतीके अथवा नर्मदा और देविका (सरयू)-के तटपर इस हवनके करनेका विधान है। रविनन्दन! इस कोटिहोममें भी सोलह ऋत्विजोंका वरण करना चाहिये। राजर्षे! सभी हवन-कार्योंमें ब्राह्मणोंको धन देना चाहिये। यजमान ऋत्विज् और आचार्यके साथ वर्षभरकी दीक्षा ग्रहण करे। राजन्! चैत्र अथवा विशेषतया कार्तिकका महीना आनेपर इस यज्ञको प्रारम्भ करना चाहिये। इसी प्रकार प्रतिवर्ष करनेका विधान है॥ ११-२०$\frac{१}{२}$॥ |


* पुण्यस्नानकी विस्तृत विधि बृहत्संहितामें दी गयी है।