मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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९६६ * मत्स्यपुराण *
| एकवीराय शर्वाय नमः पिङ्गकपर्दिने।<br>उमाभर्त्रे नमस्तुभ्यं यज्ञत्रिपुरघातिने॥ ३३<br>शुद्धबोधप्रबुद्धाय मुक्तकैवल्यरूपिणे।<br>लोकत्रयविधात्रे च वरुणोन्द्राग्निरूपिणे॥ ३४<br>ऋग्यजुःसामरूपाय पुरुषायेश्वराय च।<br>अग्र्याय चैव चोग्राय विप्राय श्रुतिचक्षुषे॥ ३५<br>रजसे चैव सत्त्वाय तमसे तिमिरात्मने।<br>अनित्यनित्यभावाय नमो नित्यचरात्मने॥ ३६<br>व्यक्ताय चैवाव्यक्ताय व्यक्ताव्यक्ताय वै नमः।<br>भक्तानामार्तिनाशाय प्रियनारायणाय च॥ ३७<br>उमाप्रियाय शर्वाय नन्दिवक्त्राञ्चिताय च।<br>ऋतुमन्वन्तरकल्पाय पक्षमासदिनात्मने॥ ३८<br>नानारूपाय मुण्डाय वरूथपृथुदण्डिने।<br>नमः कपालहस्ताय दिग्वासाय शिखण्डिने॥ ३९<br>धन्विने रथिने चैव यतये ब्रह्मचारिणे।<br>इत्येवमादिचरितैः स्तुतं तुभ्यं नमो नमः॥ ४०<br>एवं सुरासुरैः स्थाणुः स्तुतस्तोषमुपागतः।<br>उवाच वाक्यं भीतानां स्मितान्वितशुभाक्षरम्॥ ४१ | वीर, सर्वस्वरूप और पीले रंगकी जटा धारण करनेवालेको अभिवादन है। उमाके पति तथा यज्ञ एवं त्रिपुरका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। आप शुद्ध ज्ञानसे परिपूर्ण, मुक्त कैवल्यरूप, तीनों लोकोंके विधाता, वरुण, इन्द्र और अग्निके स्वरूप, ऋक्, यजुः और सामवेदरूप, पुरुषोत्तम, परमेश्वर, सर्वश्रेष्ठ, भयंकर, ब्राह्मणस्वरूप, श्रुतिरूप नेत्रवाले, सत्त्व, रजस्, तमस्—तीनों गुणोंसे युक्त अन्धकारस्वरूप, अनित्य और नित्य भावसे सम्पन्न तथा नित्यचरात्मा हैं। आपको प्रणाम है। आप व्यक्त, अव्यक्त और व्यक्ताव्यक्त हैं, आपको अभिवादन है। आप भक्तोंकी पीड़ाके विनाशक, नारायणके मित्र, उमाके प्रियतम, संहारकर्ता, नन्दीके मुखसे सुशोभित, मन्वन्तर-कल्प-ऋतु-मास-पक्ष-दिनरूप, अनेक रूपधारी, मुण्डित सिरवाले, स्थूल दण्ड और कवच धारण करनेवाले, खप्परधारी, दिगम्बर, चूडाधारी, धनुषधारी, महारथी, संन्यासी और ब्रह्मचारी हैं, आपको नमस्कार है। इस प्रकारके अनेकों चरित्रोंसे स्तुत होनेवाले आपको बारंबार प्रणाम है। इस प्रकार देवासुरोंद्वारा स्तवन किये जानेपर शंकरजी प्रसन्न हो गये। तब वे उन भयभीत देवासुरोंसे मुसकराते हुए सुन्दर अक्षरोंसे युक्त वचन बोले॥ २८-४१॥ |
| श्रीशंकर उवाच<br>किमर्थमागता ब्रूत त्रासम्लानमुखाम्बुजाः।<br>किं वाभीष्टं ददाम्यद्य कामं प्रब्रूत मा चिरम्।<br>इत्युक्तास्ते तु देवेन प्रोचुस्तं ससुरासुराः॥ ४२ | **भगवान् श्रीशंकरने कहा—**देवता एवं दानवो! तुम्हारे मुखकमल भयके कारण मलिन दीख रहे हैं, बतलाओ, तुमलोग यहाँ किसलिये आये हो? मैं आज तुमलोगोंको कौन-सी अभीष्ट वस्तु दूँ, यह निर्भय होकर बतलाओ, देर मत करो। भगवान् शंकरद्वारा ऐसा कहे जानेपर देवासुरोंने उनसे इस प्रकार कहा॥ ४२॥ |
| सुरासुरा ऊचुः<br>अमृतार्थे महादेव मथ्यमाने महोदधौ।<br>विषमद्भुतमुद्भूतं लोकसंक्षयकारकम्॥ ४३<br>स उवाचाथ सर्वेषां देवानां भयकारकः।<br>सर्वान् वो भक्षयिष्यामि अथवा मां पिबन्त्वथ॥ ४४<br>तमशक्ता वयं ग्रस्तुं सोऽस्माञ्शक्तो बलोत्कटः।<br>एष निःश्वासमात्रेण शतपर्वसमद्युतिः॥ ४५<br>विष्णुः कृष्णः कृतस्तेन यमश्च विषमात्मवान्।<br>मूर्च्छिताः पतिताश्चान्ये विप्रणाशं गताः परे॥ ४६ | **देवासुर बोले—**महादेव! अमृतके लिये महासागरको मथते समय अद्भुत विष उत्पन्न हुआ है, जो सभी लोकोंका विनाश करनेवाला है। सभी देवताओंको भयभीत करनेवाले उस विषने स्वयं कहा है कि 'मैं तुम सभीको खा जाऊँगा, अन्यथा तुमलोग मुझे पी जाओ।' ऐसी दशामें हमलोग उस विषको पान करनेमें सर्वथा असमर्थ हैं, किंतु वह महाबली विष हमलोगोंको खा सकता है। उसने अपने निःश्वासमात्रसे सैकड़ों चन्द्रमाके समान कान्तिमान् भगवान् विष्णुको कृष्णवर्ण तथा यमराजको विक्षिप्त कर दिया है। कुछ लोग मूर्छित हो गये हैं और कुछ नष्ट हो गये। |