भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९७८ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अकालमृत्युभयदं परचक्रभयावहम्।<br>धनाख्यं पूर्वयाम्यभ्यां शालाभ्यां यद् शालकम्॥ ११वह अकालमृत्यु तथा शत्रुपक्षसे भय उत्पन्न करनेवाला होता है। जो पूर्व और दक्षिणकी शालाओंसे युक्त द्विशाल भवन हो, उसे 'धन' कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये शस्त्र तथा पराजयका भय उत्पन्न करनेवाला होता है।
तच्छस्त्रभयदं नृणां पराभवभयावहम्।<br>चुल्ली पूर्वापराभ्यां तु सा भवेन्मृत्युसूचनी॥ १२इसी प्रकार केवल पूर्व तथा पश्चिमकी ओर बना हुआ 'चुल्ली' नामक द्विशालभवन मृत्युसूचक है। वह स्त्रियोंको विधवा करनेवाला तथा अनेकों प्रकारका भय उत्पन्न करनेवाला होता है।
वैधव्यदायकं स्त्रीणामनेकभयकारकम्।<br>कार्यमुत्तरयाम्यभ्यां शालाभ्यां भयदं नृणाम्॥ १३केवल उत्तर एवं दक्षिणकी शालाओंसे युक्त द्विशाल भवन मनुष्योंके लिये भयदायक होता है। अतः ऐसे भवनको नहीं बनवाना चाहिये।
सिद्धार्थवज्रवर्ज्याणि द्विशालानि सदा बुधैः।<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि भवनं पृथिवीपतेः॥ १४बुद्धिमानोंको सदा सिद्धार्थ$^१$ और वज्रसे$^२$ भिन्न द्विशालभवन बनवाना चाहिये॥ १-१३$\frac{१}{२}$॥<br><br>अब मैं राजभवनके विषयमें वर्णन कर रहा हूँ।
पञ्चप्रकारं तत् प्रोक्तमुत्तमादिविभेदतः।<br>अष्टोत्तरं हस्तशतं विस्तरश्चोत्तमो मतः॥ १५वह उत्तम आदि भेदसे पाँच प्रकारका कहा गया है। एक सौ आठ हाथके विस्तारवाला राजभवन उत्तम माना गया है।
चतुर्ष्वन्येषु विस्तारो हीयते चाष्टभिः करैः।<br>चतुर्थांशाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वपि निगद्यते॥ १६अन्य चार प्रकारके भवनोंमें विस्तार क्रमशः आठ-आठ हाथ कम होता जाता है; किंतु पाँचों प्रकारके भवनोंमें लम्बाई विस्तारके चतुर्थांशसे अधिक होती है।
युवराजस्य वक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम्।<br>षड्भिः षड्भिस्तथाशीतिर्हीयते तत्र विस्तरात्॥ १७अब मैं युवराजके पाँच प्रकारके भवनोंका वर्णन कर रहा हूँ। उसमें उत्तम भवनकी चौड़ाई अस्सी हाथकी होती है। अन्य चारकी चौड़ाई क्रमशः छः-छः हाथ कम होती जाती है।
त्र्यंशेन चाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वपि निगद्यते।<br>सेनापतेः प्रवक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम्॥ १८इन पाँचों भवनोंकी लम्बाई चौड़ाईसे एक तिहाई अधिक कही गयी है। इसी प्रकार अब मैं सेनापतिके पाँच प्रकारके भवनोंका वर्णन कर रहा हूँ।
चतुःषष्टिस्तु विस्तारात् षड्भिः षड्भिस्तु हीयते।<br>पञ्चस्वेतेषु दैर्घ्यं च षड्भागेनाधिकं भवेत्॥ १९उसके उत्तम भवनकी चौड़ाई चौंसठ हाथकी मानी गयी है। अन्य चार भवनोंकी चौड़ाई क्रमशः छः-छः हाथ कम होती जाती है। इन पाँचोंकी लम्बाई चौड़ाईके षष्ठांशसे अधिक होनी चाहिये।
मन्त्रिणामथ वक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम्।<br>चतुश्र्चतुर्भिर्हीना स्यात् करषष्टिः प्रविस्तरे॥ २०अब मैं मन्त्रियोंके भी पाँच प्रकारके भवन बतला रहा हूँ। उनमें उत्तम भवनका विस्तार साठ हाथ होता है तथा अन्य चार क्रमशः चार-चार हाथ कम चौड़े होते हैं।
अष्टांशेनाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वपि निगद्यते।<br>सामन्तामात्यलोकानां वक्ष्ये भवनपञ्चकम्॥ २१इन पाँचोंकी लम्बाई चौड़ाईके अष्टांशसे अधिक कही गयी है। अब मैं सामन्त, छोटे राजा और अमात्य (छोटे मन्त्री) लोगोंके पाँच प्रकारके भवनोंको बतलाता हूँ।
चत्वारिंशत् तथाष्टौ च चतुर्भिर्हीयते क्रमात्।<br>चतुर्थांशाधिकं दैर्घ्यं पञ्चस्वेतेषु शस्यते॥ २२इनमें उत्तम भवनकी चौड़ाई अड़तालीस हाथकी होनी चाहिये तथा अन्य चारोंकी चौड़ाई क्रमशः चार-चार हाथ कम कही गयी है। इन पाँचों भवनोंकी लम्बाई चौड़ाईकी अपेक्षा सवाया अधिक कही गयी है।

१. एक प्रकारका स्तम्भ जिसमें ८ पहल या कोण होते हैं।
२. जिस द्विशालमें केवल दक्षिण और पश्चिमकी ओर भवन हों (वृहत्संहिता ५३। ३९)।