मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय २५६ * | ९८५ |
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| रक्षां कुर्वीत यत्नेन स्तम्भोपद्रवनाशिनीम्॥ २६<br>तथा फलवतीं शाखां स्तम्भोपरि निवेशयेत्।<br>प्रागुदकप्रवणं कुर्याद् दिङ्मूढं तु न कारयेत्॥ २७<br>स्तम्भं वा भवनं वापि द्वारं वासगृहं तथा।<br>दिङ्मूढे* कुलनाशः स्यान्न च संवर्धयेद् गृहम्॥ २८<br>यदि संवर्धयेद् गेहं सर्वदिक्षु विवर्धयेत्।<br>पूर्वेण वर्धितं वास्तु कुर्याद् वैराणि सर्वदा॥ २९<br>दक्षिणे वर्धितं वास्तु मृत्यवे स्यान्न संशयः।<br>पश्चाद् विवृद्धं यद् वास्तु तदर्थक्षयकारकम्॥ ३०<br>वर्धापितं तथा सौम्ये बहुसन्तापकारकम्।<br>आग्नेये यत्र वृद्धिः स्यात् तदग्निभयदं भवेत्॥ ३१<br>वर्धितं राक्षसे कोणे शिशुक्षयकरं भवेत्।<br>वर्धापितं तु वायव्ये वातव्याधिप्रकोपकृत्॥ ३२<br>ईशान्यामन्नहानिः स्याद् वास्तौ संवर्धिते सदा।<br>ईशाने देवतागारं तथा शान्तिगृहं भवेत्॥ ३३<br>महानसं तथाग्नेये तत्पार्श्वे चोत्तरे जलम्।<br>गृहस्योपस्करं सर्वं नैर्ऋत्ये स्थापयेद् बुधः॥ ३४<br>बन्धस्थानं बहिः कुर्यात् स्नानमण्डपमेव च।<br>धनधान्यं च वायव्ये कर्मशालां ततो बहिः।<br>एवं वास्तुविशेषः स्याद् गृहभर्तुः शुभावहः॥ ३५ | स्तम्भके उपद्रवोंका विनाश करनेवाली रक्षा-विधि भी यत्नपूर्वक सम्पन्न करनी चाहिये। इसके लिये स्तम्भके ऊपर फलोंसे युक्त वृक्षकी शाखा डाल देनी चाहिये। स्तम्भ उत्तर या पूर्वकी ओर ढालू होना चाहिये, अस्पष्ट दिशामें नहीं कराना चाहिये। इस बातका ध्यान भवन, स्तम्भ, निवासगृह तथा द्वार निर्माणके समय भी स्थापन रखना चाहिये; क्योंकि दिशाकी अस्पष्टतासे कुलका नाश हो जाता है। घरके किसी अंशको पिण्डसे आगे नहीं बढ़ाना चाहिये। यदि बढ़ाना ही हो तो सभी दिशामें बढ़ावे। पूर्व दिशामें बढ़ाया गया वास्तु सर्वदा वैर पैदा करता है, दक्षिण दिशाकी ओर बढ़ाया हुआ वास्तु मृत्युकारी होता है, इसमें संदेह नहीं है। जो वास्तु पश्चिमकी ओर बढ़ाया जाता है, वह धनक्षयकारी होता है तथा उत्तरकी ओर बढ़ाया हुआ दुःख एवं सन्तापकी वृद्धि करता है। जहाँ अग्निकोणमें वृद्धि होती है, वहाँ वह अग्निका भय देनेवाला नैर्ऋत्यकोण बढ़ानेपर शिशुओंका विनाशक, वायव्य कोणमें बढ़ानेपर वात-व्याधि-उत्पादक, ईशान कोणमें बढ़ानेपर अन्नके लिये हानिकारक होता है। गृहके ईशान कोणमें देवताका स्थान और शान्तिगृह, अग्निकोणमें रसोई घर और उसके बगलमें उत्तर दिशामें जलस्थान होना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष सभी घरेलू सामग्रियोंको नैर्ऋत्य कोणमें करे। पशुओं आदिके बाँधनेका स्थान और स्नानागार गृहके बाहर बनाये। वायव्य कोणमें अन्नादिका स्थान बनाये। इसी प्रकार कार्यशाला भी निवास-स्थानसे बाहर बनानी चाहिये। इस ढंगसे बना हुआ भवन गृहपतिके लिये मङ्गलकारी होता है॥ २६–३५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यायां गृहनिर्णयो नाम षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुविद्याके प्रसङ्गमें गृहनिर्णय कथन नामक दो सौ छप्पनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५६॥
* वाल्मी० ३।६०।६, बृहत्संहिता ५३।११५ के अनुसार जहाँ कोई निशान प्रतीत हो, वे भवनादि विमूढ कहे गये हैं।