मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः 卐 नगरविधानम् ८५ गुम्फित ) युक्त मार्ग-विन्यास को वस्तुसुभद्र कहते हैं।।६६।। नवनवमार्गाश्चैते प्राचीनाश्चाप्युदीचीनाः ।।६७।। द्वारोपद्वारयुतं कुट्टिममार्गार्गलैर्युक्तम् । राजगृहोपेतं यन्नगरं नाम्ना जयाङ्गं स्यात् ।।६८।। नौ द्वार पूर्व से निकलते हों तथा नौ द्वार उत्तर से निकलते हों, इन मार्गों पर द्वार एवं उपद्वार ( छोटे प्रवेशद्वार ) हों, इन मार्गों के साथ अर्गल-कुट्टिम मार्ग भी हों तथा नगर में राजगृह भी हो तो उसकी संज्ञा जयाङ्ग होती है।।६७-६८।। प्राचीना दश मार्गाश्चोत्तरमार्गास्तथैव स्युः । नृपमन्दिरसंयुक्तं युक्त्यानेकार्गलोपेतम् ।।६९।। बहुकुट्टिमसंयुक्तं विजयं नाम्ना वरैः प्रोक्तम् । पूर्व दिशा से दश मार्गों का प्रारम्भ होता हो तथा उत्तर दिशा से भी दश मार्ग निकलते हों; साथ ही इन मार्गों के साथ अनेक अर्गलायुक्त कुट्टिम मार्ग हों तथा नगर में राजभवन भी हो तो उसे श्रेष्ठ जनों ने विजय संज्ञा प्रदान की है।।६९।। प्राचीनास्त्वेकादश मार्गा रुद्रा उदीचीनाः ।।७०।। ब्रह्मांशादपरांशो यदभीष्टं तत्र नृपवासम् । तन्मुखतोऽदभ्रमहाङ्गणकं स्यादिष्टभागे तु ।।७१।। ( सर्वतोभद्र योजना में ) पूर्व से ग्यारह मार्ग तथा उत्तर से ग्यारह मार्ग निकलते हों, ब्रह्मभाग के पश्चिम में इच्छित स्थान पर राजा का आवास हो, उसके सम्मुख बहुत विशाल आँगन होना चाहिये।।७०-७१।। तत्रान्तःपुरवासं शेषं सर्वं समुन्नेयम् । तत्राागुदग्गतमार्गा सा कथिता राजवीथीति ।।७२।। इसके पश्चात् अभीष्ट स्थान पर रानियों का आवास होना चाहिये। पूर्व से निकले मार्ग को राजवीथी कहते हैं।।७२।। तस्या द्विपार्श्वयोः स्यात्सैश्वर्याणां तु मालिकापङ्क्तिः । तत्पार्श्वयोर्निवासो वणिजां स्यात्तस्य दक्षिणतः ।।७३।। स्यात्तन्तुवायवासं ह्युत्तरतश्चक्रिणां वासम् । तत्तज्जात्यन्तरगृहमथ तत्सामीप्यतः कुर्यात् ।।७४।। राजवीथी के दोनों पार्श्वों में धनाढ्य लोगों की मालिका-पङ्क्ति ( भवनों की पङ्क्ति ) होनी चाहिये। उनके पार्श्वों में व्यापारियों का आवास होना चाहिये। उसके दक्षिण में