मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः 卐 भूलम्बविधानम् ९७ एकहस्तं द्विहस्तं वा क्षुद्रमेकतलं स्मृतम्। युग्मायुग्मकरैर्मानैर्हस्तार्धोनसमन्वितैः ॥७॥ केचिद् वदन्ति देवानां मानुषाणां विमानके। विस्तारे सप्तषट्पञ्चचतुरूर्ध्वंशेऽधिकं त्रिभिः ॥८॥ अथवा एक तल का क्षुद्र प्रमाण एक हाथ या दो हाथ कहा गया है। कुछ विद्वान् देवों एवं मनुष्यों के कई तल वाले भवन के विस्तारप्रमाण में आधा हाथ जोड़ने या कम करने के लिये कहते हैं। यह सम या विषम संख्या वाले सभी हस्त-प्रमाण के लिये हैं। (लम्बाई के लिये) विस्तारप्रमाण में तीन के साथ विस्तार का सात, छः, पाँच, चार या तीन अंश अधिक जोड़ना चाहिये॥७-८॥ शान्तिकं पौष्टिकं जयदमद्भुतं सार्वकामिकम्। उच्छ्रायं द्विगुणं पादार्धाधिकं चापि सम्मतम् ॥९॥ शान्तिक, पौष्टिक, जयद, अद्भुत एवं सार्वकामिक भवनों में पूर्वोक्त प्रमाण के अतिरिक्त भवन की ऊँचाई उसके चौड़ाई की दुगुनी, डेढ़गुनी अथवा सवा गुनी अधिक होनी चाहिये॥९॥ पञ्चदशकरव्यासाद्धीनं क्षुद्रविमानकम्। सप्ताष्टाधिकपङ्क्त्यादिद्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥१०॥ चौड़ाई में पन्द्रह हाथ से कम माप का भवन क्षुद्रविमानक होता है। सत्रह या अट्ठारह हाथ से प्रारम्भ कर दो-दो हाथ बढ़ाना चाहिये॥१०॥ आसप्ततेश्चतुर्भूम्यादीनि त्रीणि मतानि च। सप्तविंशतिभेदानि द्वादशान्तान्यनुक्रमात् ॥११॥ (दो-दो हाथ बढ़ाते हुये) सत्तर हाथ तक माप ले जाना चाहिये। चार तल से बारह तलपर्यन्त भवन के सत्ताईस भेद होते हैं एवं इनमें से प्रत्येक के तीन भेद होते हैं॥११॥ त्रिचतुर्विंशतिरतलेर्यावच्छतकरान्तकम् । त्रित्रिहस्तविवृद्ध्या तु त्रिनवोत्सेधमिष्यते ॥१२॥ तेईस या चौबीस हाथ से प्रारम्भ कर एक सौ हाथ तक तीन-तीन हाथ बढ़ाते हुये भवन के सत्ताईस प्रकार के ऊँचाई के प्रमाण-भेद प्राप्त होते हैं॥१२॥ एवमुत्कृष्टमानेषु श्रेष्ठमध्याधमं भवेत्। त्रिचतुष्पङ्क्तिहस्तादिद्विद्विहस्तविवर्धनात् ॥१३॥ मय०-१७