मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशोऽध्यायः 卐 पादप्रमाणद्रव्यपरिग्रहविधानम् १५५ कार्तमालश्च खदिरः खादिरश्च मधूककः । राजादनो यथासङ्ख्यं विस्तारायाममुच्यते ॥१०५॥ मुहूर्त्त-स्तम्भ—देवों एवं द्विजातियों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ) के मुहूर्त्तस्तम्भ ( का काष्ठ ) क्रमशः इस प्रकार होता है—कार्तमाल, खदिर, खादिर, मधूक एवं राजा- दन। इनका विस्तार एवं लम्बाई क्रमशः इस प्रकार वर्णित है—॥१०४-१०५॥ भानुरुद्रदशद्वारवितस्त्यायामसंयुताः । तत्सङ्ख्याङ्गुलिविस्तीर्णाः पङ्क्त्यंशोनाग्रविस्तराः ॥१०६॥ इनकी ऊँचाई ( या लम्बाई ) बारह, ग्यारह, दश या नौ वितस्ति ( बित्ता ) एवं विस्तार भी इतने ही अंगुल का होता है। इसके अग्र भाग ( शीर्ष भाग ) का विस्तार दश भाग कम होता है॥१०६॥ भूतसार्धचतुर्वेदगुणतालनिखातकाः । भूमिभूमिवशादुक्तं स्तम्भोच्चं विपुलं तु वा ॥१०७॥ गर्त में रहने वाले मूल भाग की चौड़ाई पाँच, साढ़े चार, चार या तीन बित्ता होनी चाहिये। अथवा स्तम्भ की ऊँचाई एवं चौड़ाई भवन के तल के अनुसार रखनी चाहिये॥१०७॥ झषालाङ्घ्रौ तु सर्वत्र निखातं परिवर्जयेत्। झषालाङ्घ्रि स्तम्भ में सभी स्थानों पर गर्त का परित्याग करना चाहिये॥१०७॥ अश्वत्थोदुम्बरश्चैव प्लक्षश्च वटवृक्षकः ॥१०८॥ सप्तपर्णश्च बिल्वश्च पलाशः कुटजस्तथा। पीलुः श्लेष्मातकी लोध्रः कदम्बः पारिजातकः ॥१०९॥ शिरीषः कोविदारश्च तिन्त्रिणीको महाद्रुमः । शिलीन्ध्रः सर्पमारश्च शाल्मली सरलस्तथा ॥११०॥ किंशुकश्चारिमेदश्चाभयाक्षामलकद्रुमाः । कपित्थः कण्टकश्चैव पुत्रजीवश्च डुण्डुकः ॥१११॥ कारस्करः करञ्जश्च वरणश्चाश्वमारकः । बदरो वकुलः पिण्डी पद्माकस्तिलकस्तथा ॥११२॥ पाटल्यगरुकर्पूरा न ग्राह्या गृहकर्मणि । देवयोग्या इमे सर्वे मानुषाणामनर्थदाः ॥११३॥ तस्मात् सर्वप्रयत्नेन गृह्णीयान्न नरालये।