मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ मयमतम् इसी प्रकार क्षुद्रनीड होना चाहिये। गल-नासिकायें चौंसठ होनी चाहिये। नासिकाओं का अलङ्करण स्वस्तिक की आकृति का होना चाहिये। इस भवन की संज्ञा 'भद्रकोष्ठ' उचित ही है।।४७।। ✵ वृत्तकूटम् ✵ तदेव वर्तुलं कर्णकूटमूर्ध्वोर्ध्वभूमिके ॥४८॥ मस्तकं तस्य वृत्तं स्याच्चतुर्नासीसमन्वितम् । वृत्तकूटमिदं नाम्ना देवानां सार्वदेशिकम् ॥४९॥ जब प्रत्येक ऊपरी तल में वृत्ताकर कर्ण-कूट निर्मित हों, शिखर वृत्ताकार हो तथा चार नासियों से युक्त हो, तो उस देवालय को 'वृत्तकूट' कहते हैं। यह देवालय सर्वदा देवों के अनुकूल होता है।।४८-४९।। ✵ सुमङ्गलम् ✵ तदेवाष्टांशमाधिक्यमायतं चतुरस्रकम् । कर्णकूटं युगास्रं स्यादायतं वृत्तमस्तकम् ॥५०॥ कोष्ठभद्रं विना तत्र शेषं पूर्ववदाचरेत् ।