भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ६१ अथवा गृह के विन्यास हेतु सकल ( एकपद वास्तु ) से लेकर आसन ( एक हजार पद वास्तु ) तक ( किसी उपयुक्त ) पदविन्यास को ग्रहण करना चाहिये ।।५५।। क्षुद्रग्रामे मार्गाश्चत्वारश्चाष्ट मध्यमे ग्रामे । द्वादश षोडश मार्गा ग्रामेषूत्कृष्टकेषु मताः ।।५६।। छोटे ग्राम में चार मार्ग, मध्यम ग्राम में आठ मार्ग एवं उत्तम ग्राम में बारह अथवा सोलह मार्ग होते हैं ।।५६।। ❋ द्वाराणि ❋ भल्लाटे च महेन्द्रे राक्षसपादे तु पुष्पदन्तपदे । द्वारायतनस्थानं जलमार्गांश्चापि चत्वारः ।।५७।। द्वार — भल्लाट, महेन्द्र, राक्षस एवं पुष्पदन्त पद द्वारस्थापन के स्थान हैं तथा जलमार्ग भी चार हैं ।।५७।। वितथपदेऽथ जयन्ते सुग्रीवांशे च मुख्यदेवपदे । भृशपूषभृङ्गराजा दौवारिकशोषनागदितिजलदाः ।।५८।। जलमार्ग के चार वास्तु-पद वितथ, जयन्त, सुग्रीव एवं मुख्य हैं ! भृश, पूषा, भृङ्गराज, दौवारिक, शोष, नाग, दिति एवं जलद — ।।५८।। स्थानमुपद्वाराणामष्टौ देवा इमे कथिताः । त्रिकरं पञ्चकरं तत् सप्तकरं द्वारविस्तरम् ।।५९।। इन आठ वास्तुदेवों के पद उपद्वार के स्थान हैं। इन उपद्वारों का विस्तार तीन, पाँच या सात हस्त होता है ।।५९।। तारद्विगुणोत्सेधं चाध्यर्धं वाऽङ्घ्रिहीनं तत् । सर्वेषां ग्रामाणां परितः परिखा बहिश्च वप्राश्च ।।६०।। इन उपद्वारों की ऊँचाई उसकी चौड़ाई की दुगुनी, डेढ़ गुनी अथवा तीन चौथाई होनी चाहिये। सभी ग्रामों के चारो ओर बाहर परिखा ( खाई ) एवं वप्र ( प्राचीर, घेरने वाली भित्ति ) होनी चाहिये ।।६०।। ग्रामादयोऽपि नद्या दक्षिणतीरे तदन्वितायामाः । नवनववसुसुभागे मध्ये ब्राह्मं ततः परं दैवम् ।।६१।। नदी के दक्षिण तट पर उससे घिरे ग्राम ( उत्तम ) होते हैं। इक्यासी वास्तुपद एवं चौंसठ वास्तुपद-विन्यास से युक्त ग्राम का मध्य भाग ब्राह्मक्षेत्र एवं इसके पश्चात् दैव क्षेत्र होता है ।।६१।।