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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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५६ मीरों-वृहद्-पद-संग्रह तुम पतिबरता नारी बिना प्रभु, काहो सो न पतीज्यो जी । साचो प्रेम प्रीत मो नातो, ताही सो तुम रीझ्यो जी । राति दिवस ओहि ध्यान तिहारो, आपही दरसन दीज्यौ जी । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, मिलि बिछुरन मत कीज्यौ जी । इस पाठ की भाषा पर ब्रज भाषा का प्रभाव अति स्पष्ट है । प्रथम दो और अन्तिम पक्तियो के सिवा शेष पद अन्य पाठो से सर्वथा भिन्न पडता है । बीच की चार पक्तियो मे अर्थ और पूर्वापर सबध का अभाव है । इस पाठ विशेष से मिलता जुलता एक और निम्नाकित पाठ भी प्राप्त है। पाठान्तर ३, ज्यूँ जाणो ज्यूँ लीज्यो सजन, सुध ज्यूँ जाणे ज्यूँ लीज्यो । हूँ तो दासी जनम जनम की, कृपा रावरी कीज्यो । उठत बैठत जागत सोवत, कबहुँक याद करीज्यो । आवत जावत जीमत सोवत, सुपणे दरस मोये दीज्यो । में पतिबरता नारी प्रभु जी, काँहूँ ते न पतीजौ । साँचो प्रेम प्रीत को नातो, ताही ते तुम हरि रीझौ । रात दिवस मोहि ध्यान तिहारो, आय दरस मोये दीज्यौ । मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, चित चरणाँ मे लीज्यो ।† पाठान्तर ४, थे म्हारी सुध ज्यूँ जाणूँ ज्यूँ लीज्यौ । आप बिना मोहे कछु न सुहावै, बेगो ही दरसण दीज्यो । मै मद भागण करम अभागण, ओगण चित म़त दीज्यौ । विरह लगी पल छिन न लगत है, तो तन यूँही छीज्यौ । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, देख्याँ प्राणपती ज्यौ । इस पाठ की अन्तिम पक्ति भी सर्वथा भिन्न पड़ती है । प्रथम पाठ से संतमत का प्रभाव सुस्पष्ट हो उठता है, परन्तु अन्य पाठो से विरह वेदना ही विशेष तौर से लक्षित होती है ।