मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० मीराँ-बृहद् पद-संग्रह मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, जोत मे जोत मिलाय ॥१७१॥† “ऐ मीराँ थारो भायलो गोपाल” पक्ति विशेष ध्यान देने योग्य है। प्रथम पक्ति के आधार पर यह पद, पद स० ४ का पाठान्तर ही ही प्रतीत होता है परन्तु शेष पदाभिव्यक्ति सर्वथा भिन्न पडती है। ९ राणा जी महल पधारिया जी, कर केस दिया साज । राणी जी पाछा फिर गया जी, राणो जी जान्या म्हासूँ लाज । राणो जी बूझे काई ओ लागै गोपाल । राणी जी मुजरा करो सनमुख उबास्या । म्हे छाँ राणी चितोड़ का, और बरब्साँगाँ थॉने राज । मीराँ ने बुझो काई ओ लागे गोपाल । साध सत हिरदे बसे, हथलेवो को लाग्यो पाप । राणा जी बूझे काई ओ लागै गोपाल । द्योढया मे बझो काई ओ लागै गोपाल । राणा जी खडग सवाँरिया ले खाडो तरवार । किसडी मीराँ ने राणो जी मारसी, हो गई एक हजार । मीराँ ने बूझो काई ओ लागै गोपाल । राणा जी बतलावै काई ओ लागै गोपाल ॥ १७२ ॥ पदाभिव्यक्ति विशेष महत्वपूर्ण है। राणा जी के “महल” मे पधारने पर 'राणी जी' के लौट जाने के कारण राणा को भ्रम होता है। नववधू की लज्जा का यह भ्रम शीघ्र ही शका मे परिणत हो जाता है और राणा यह जानने को उत्सुक हो उठते है कि “गोपाल” और “राणी जी” के बीच क्या सबध है। मीराँ का उत्तर भी स्पष्ट है “साध सत हिरदै बसै, हथलेवो को लाग्यो पाप”। अस्तु, राणा मीराँ को मार डालने का एक बार फिर निष्फल प्रयास करते हैं। इस पंद मे और पद सं० ५ मे गहरा साम्य है। दोनो ही पदो से व्यक्त भावनाएँ और घटनाएँ एक सी हैं। अस्तु, बहुत सम्भव है कि दोनो ही पद स्वतन्त्र पद न होकर एक ही पद के रूपान्तर मात्र हो ।