मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह चल्यो जा रे असल गुवार¹ तन्ने² मेरी के पडी । गुरु म्हारा दीनदयाल हीरा रा पारखी । दियो म्होने ज्ञान बताय, सगत कर साध री । खोई कुल की लाज, मुकुन्द थारे कारणे । बेग ही लीज्यो सम्हाल मीराँ पडी बारणे³ ॥१८४॥† यह पद कुछ हेरफेर से निम्नाकित रूप मे भी मिलता है “गाई थॉरो पीहर ॰ सासू लड़ी ।” पक्ति के बाद निम्नाकित पक्ति है — “नहि म्हारो पीहर दूर घरा सासू लडी” जो पूर्वापर सगति को दखते अधिक उपयुक्त प्रतीत होती है । “दियो म्हाने ˚ साध री” पक्ति के बाद निम्नाकित चार पक्तियाँ है . इण सरवरिया रा हस, सुरग थॉरी पाखड़ी । राम मिलण कब होय फड़ुके म्हॉरी आँखड़ी । राम गये बनवास को सब रग ले गये । ले गये म्हॉरी काया को सिंगार, तुलसी की माला दे गये ।” पूर्वापर सबध देखते उपर्युक्त पक्तियाँ उपयुक्त नही प्रतीत होती । इस पदके अन्य पाठान्तरो मे भी इसकी प्रथम दो पक्तियाँ हू-बहूआयी हैं । अन्तिम दोनो पंक्तियो की अभिव्यक्ति विचारणीय है । पाठान्तर १, ऊभी मीराँ सरवरिया री पाल, मन मे आमण दूमणी४ । भर भर धोबा धोये नैन साधां रे संग जोवती⁵ । १ मूर्ख, २ तुमको, ३ शरण, ४ आमणदूमणी आशकाजनित व्याकुलता, व्याकुलतायुक्त, ५ प्रतीक्षा करती ।