मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ मीरॉँ-वृहद्-पद-संग्रह नगर बसै बामण बाणिया भीतर शुद्र पवार, मुहुँ मोडे मुलबया हसे समझे नही गवार। गढ चितौडा न रहा नही रहणा को जोग, बसस्या सूडी द्वारिका जहाँ हरि भगता का भोग। पंरख लेत परचो भयो मन उपज्यो विस्वास, सिर पर सिरजन हार रहै पूगी म्हा मन की आस। कुम्भ श्याम के देवरे मिली है राणौ राणूँ, मीराँ ने गिरधर मिलिया कोई पूरबली पहिचाण। ।।१९८।।† पदाभिव्यक्ति के प्रथम और द्वितीय अर्द्धांशो मे कोई सगति नही बैठती प्रतीत होती। मीराँ द्वारा किए गए गृहत्याग का कारण भी अति स्पष्ट हो उठता है। कुम्भश्याम के मदिर के साथ मीराँ के जीवन की किसी घटना का सम्पर्क भी उपर्युक्त पदाभिव्यक्ति से स्पष्ट हो उठता है। ऐसी अभिव्यक्ति इस पद की नवीनता है। इस पद की शैली भी वर्णनात्मक ही है। ३६ प्रभु जी अरज बन्दी री सुण हो। मो निगुणी ए सुगुण साहब अवगुण धारी ए गुण हो। राणा जी विष को प्यालो भेज्यो मो चरणामृत को पण हो। म्हारी पत परमेश्वर राखत, मारण वालो कुण हो। प्रभु जी उचले¹ मदिर (सीतारामजी) बिराजे दरसण रोयण हो मीराँ के प्रभु गिरधर नागर, मै जाणु प्रभु जी कुण हो। ।।१९९।। पदाभिव्यक्ति में संगति नही है। १ ऊँचे।