मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ साथ ही साथ विभिन्न धार्मिक मतो का प्रभाव भी स्पष्ट हो जाता है। ऐसे पदो मे सर्वाधिक सख्या उन पदो की है जिनकी अभिव्यक्ति वियोगात्मक है और जो नाथ-पथ से विशेष प्रभावित हैं। विशेषत इन्ही पदाभिव्यक्तियो के आधार पर मीराँ के इष्टदेव “सगुण व साकार” प्रतीत होते हैं। राजस्थानी मे प्राप्त ‘दासी’ ओर ‘जन्’ छाप युक्त अधिकांश पदो मे विरहाकुला नारी की आराध्य से शीघ्र दर्शन देने की आतुर प्रार्थना है। ऐसे अधिकांश पदो पर विभिन्न धार्मिक मतमतान्तरो का कोई विशेष प्रभाव नही दीखता तथापि एक पद (स २८३) से सतमत का और कुछ पदो से विभिन्न पौराणिक गाथाओ का प्रभाव स्पष्ट हो जाता है। पद स० २८४ ही एक ऐसा पद हैं जिसमे रणछोड जी का वर्णन हुआ है। • ब्रज मिश्रित राजस्थानी मे प्राप्त पदाभिव्यक्ति भी वियोग-द्योतक ही है। इन पदो पर पौराणिक गाथा और नाथ-पथ का समान रूपेण प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। ब्रजभाषा मे प्राप्त ऐसे पदो पर सतमत का ही विशेष प्रभाव है। इन पदाभिव्यक्तियो से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ख्याति फैलने के बाद परिवारवालो से मीराँ को सम्मान मिला। “कुल कुटुम्बी आन बैठे, मनहुँ मधुमासी। दास मीरा लाल गिरधर, मिटी जग हाँसी।” यह एक विशेष विचारणीय पहलू है। अन्य कुछ पदो से आनन्द और दृढ भक्ति-भाव भी लक्षित होता है। कुछ पदो पर पौराणिक गाथाओ का भी प्रभाव मिलता है परन्तु ऐसे पदो मे भाव-गाम्भीर्य नही है। गुजराती मे प्राप्त पदो मे पौराणिक गाथाओ के साथ ही निर्वेद की भी अभिव्यक्ति मिलती हैं। पजाबी मे एक ही पद प्राप्त होता है जिसकी भी प्रामाणिकता संदिग्ध ही है। ‘दास’ और ‘जन’ प्रयोग की परम्परा अन्य भक्त-कवियो में भी प्राप्त होती है। एच० एच० विल्सन के मतानुसार दक्षिण भारत मे ‘मीराँ दासी’ सम्प्रदाय की स्थापना हुई थी। श्री नटवर नडियाल भी अपनी पुस्तक मे इस सम्प्रदाय की कुछ चर्चा करते हैं। अन्यत्र कही कोई ऐसा स्पष्ट उल्लेख नही मिलता जिसके आधार पर इस सम्प्रदाय का इतिहास जाना जा सके। • हिन्दी जगत् मे मीराँ सर्व-प्रथम एक भक्तिमती नारी के ही रूप मे आँती है। इनके नाम पर प्रचलित विभिन्न पदो से विभिन्न धार्मिक