मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह १२ राम कहिये रे गोविन्द कहि मेरे। ककर हीरा एक सरसा, हीरा किस कूँ कहिए रे। हीरा पण तो जब ही जांणूँ, महगा मोल बिकइए रे। कोयल कागा एक सरसा, कोयल किस को कहिए रे। कोयलपण तो जब ही जाणूँ, मीठा बचन सुनाइये रे। हसा बगुला एक सूरीखा, हसा किस कूँ कहिए रे। हसा पण तो जद ही जाणूँ, चुग चुग मोती खइये रे। जगत भगत के आवरे है, भगत किसकूँ कहिए रे। भगत पणो तो जबही जाणूँ, बोल सभी का सहिए रे। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, हरि चरणा चित दइए रे। द्वारका के ठाकुर के सरण मे, जाकर रहिए रे ॥३५२॥ १३ रमइया बिन या जिवड़ो दु ख पावै, कहो कुण धीर बँधावै। या ससार कुबुध१ को माडो२, साध सगति नही भावै। राम की निन्दा ठाणै, करम ही करम कुमावै३। राम नाम बिनु मुकुति न पावै, फिर चौरासी जावै। साध सगति कबहू न जावै, मूरख जनम गवावै। मीराँ प्रभु गिरधर के सरणे, जीव परम पद पावै ॥३५३॥† पद की पाँचवी पक्ति मे पुनरुक्ति है। प्रथम पक्ति को वियोग द्योतंक पदो मे प्राप्त पक्ति का ही रुपान्तर कहा जा सकता है। इस पक्ति से व्यक्त होने वाली वियोग वेदना का कोई आभास शेष पद पर नही! १ कुबुद्धि, पाप, २ पात्र, ३ कमाता हैं।