मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 299, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ें२४६ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह शंख गदा पद्म विराजै, गुंज माल मेरे हिये अटकी। अन्तरधान भये गोपिन मे, सुध न रही जमुना तटकी। पात पात वृन्दावन ढूँढै, कुज कुज राधा लटकी। जमुना के तीरे धेनु चरावै, सुरत रही वशी वट की। फूलन के जामा कदम की छैया, गोपिन की मटुकी पटकी। मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, जानत हो सब के घटकी ॥४२४॥† पदाभिव्यक्ति मे सगति नही है। चतुर्थ और सातवी पक्तियाँ अर्थ-विहीन ही प्रतीत होती है, अत पद की प्रामाणिकता सहज सदिग्ध है। १५ यदुबर लागत है मोहि प्यारो। मथुरा मे हरि जन्म लियो है, गोकुल मे पग धारो। जन्मत ही पूतना गति दीनी, अधम उधारन हारो। यमुना के तीर धेनु चरावै, ओढे कामलो कारो। सुन्दर बदन दल लोचन, पीताम्बर पर वारो। मोर मुकुट मकराकृत कुडल, कर मे मुरली धारो। शंख चक्र गदा पद्म विराजै, संतन को रखवारो। जल डूबत ब्रज राखि लियो है, कर पर गिरिवर धारो। मीराँ प्रभु गिरिधर नागर, जीवन प्राण हमारो। ॥४२५॥ १६ भज केशव गोविन्द गोपाल हरि हरि, राधेश्याम पहिरे बनमाला। मथुरा मे हरि जन्म लियो है, गोकुल फुलै नन्दलाला। गोपी के कन्हैया बलभद्र जी के भैया, भक्त वच्छल प्रभु प्रतिपाला। पूतना को जननी गति दीन्ही, अधम उधारन नन्दलाला। मोर मुकुट पीताम्बर सोहैं, गल बैजन्ती माला।