मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 325, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ें२७४ मीराँ-बृहद्-पद-संग्रह स्वपनाना सुख डारे स्वपने पही गया रे लोल ; देहड़ लीमां प्रगट्या दारुण दुख जो । पूरण पाप मल्यां रे ओ अबला तणां रे लोल , जेनो परण्यो पर घेर रमवा जाय जो । अवोलड़ा लीधा रे वाले वेहाथीरे लोल, जे नारी नूं जोबन भोला खाय जो । पाणीडा पीनेरे घर शूं पूछिये रे लोल, तेरीं पिता ओ शोध्या पूरण बैर जो । उद्देरी आपी रे ओना हात मारे लोल, गल थूथ़ी मा घोल न पाया अरे जो । शोकडलीना वे मने बहु साभवरे लोल, नयणथी छूटे छै जलनी धार जो । हैडू नव फोड्यू रे हजूए अमतणूं रे लोल, उर ऊपर काई अहचा मेघ मलार जो । रावा ने मेण सूं बोलो मुख कीरे लोल, कुलवन्ती तमे केम करो कल्यान्त जो । पटराणी तमथी बीजी घारी न थी रे लोल, घणो वधारे घरे घरे विरोध जो । साँचू जो कहु तो तमे नव सांभलो रे लोल; तोरा तमारू मन नव माने काम जो । मोहन जी कहेरे सती तमे साभलोरे लोल; कहो तो मंगावू पारिजातक नू आड़ जो । आणी ने रोपाऊ तमारो ऑगणे रे लोल; राणी रोषत जी ने मूको राड़ जो ।।४९५।।†