मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनाथ-प्रभाव द्योतक पद २९७ बिसरयाँ बोहो˙ दिन भया, बिसरयो पलक न जाइ । ऐक बेरी देह फेरि, नगरि हमारै आइ । वा मूरत म्हारे मन बसे, बिसरयो पलधू न जाइ । मीराँ के कोई नहि दूजौ, दरसण दीजो आइ । प्रथम पाठ की अभिव्यक्ति मे अधिक सगति है ।
६ म्हाँरो घर रमतो ही आई रे तू जोगिया । कानाँ बिच कुंडल, गले बिच सेली, अग भभूत रमाई रे । तुम देख्याँ बिन कल न पड़त है, ग्रिह आँगणी न सुहाई रे । मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, दरसण द्यो मोकूँ आई रे ॥५३८॥ पद की प्रथम पक्ति मे प्रयुक्त “म्हाँरो” र्शब्द के स्थान पर “सारो” का प्रयोग भी कही कही मिलता है । अर्थ सगति के विचार से “म्हारो” का प्रयोग ही अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होता है । पद की अन्तिम पक्तियो के निम्नाकित पाठान्तर भी मिलते हैं:— “मीराँ के प्रभु गिरिधर नागर, ध्यावै सेस महेस”। और “मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, तज दियो नगर नरेस”
७ जोगिया जी दरसण दीजो राज । कर जोडिया करण कहूँ, म्हाँरी बाहा गहवाँ की लाज । लोक लाज जब सारी डारी, छाडचो जग उपदेस । ब्रह्म अगिन मे प्राण दाझे, म्हाँरो सुण लीजो आदेस । साँच मुद्रा भाव कंथा, साज्यो नष सब साज । जोगणि होय जग ढूँढसूं रे, म्हाँरी घर घर फेरी आस । दरध दिवानी तन देषि आपनूं, मिलिया परम दयाल । मीराँ के मनि आनन्द हुआ, रुम रूम षुसियाल ॥५३९॥†