मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 335 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वमेघः ७७
**कोशः—**विद्वान् विपश्चित् दोषज्ञः सन् सुधीः कोविदो बुधः, इत्यमरः। स्याद्धर्ममस्त्रियां पुण्यं श्रेयसी सुकृतं वृषः, इत्यमरः। द्यो दिवो द्वे स्त्रियामभ्रं व्योमपुष्करमम्बरम्, इत्यमरः। शोभा सम्पत्ति पद्मासु लक्ष्मीः श्रीरिव दृश्यते, इति शाश्वतः। विशालात्विन्द्रवारुण्यामुज्जयिन्यां तु योषिति, इति मेदिनी।
**टिप्पणी—उदयनकथा—**विदन्तीति विदाः—ज्ञानार्थक विद् धातु से "इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः" इस सूत्र से क प्रत्यय लाकर "विदाः" यह रूप बना है। ओकसः (वेद्यस्थान के) विदाः = कोविदाः यहाँ महोपाध्याय मल्लिनाथजी ने "ओकस" शब्द के ओकार का "पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्" इस नियमानुसार लोप करके "कोविद" शब्द की साधुता निष्पन्न करते हैं। अर्थात् "कोविद" शब्द का अर्थ हुआ "वेद्य" स्थान के जानकार। वत्सराज उदयन की कथा पैशाची भाषा में लिखित सम्प्रति अनुपलब्ध वृहतकथा में, वृहतकथामञ्जरी, कथासरित्सागर, भास लिखित "स्वप्नवासवदत्तम्", रत्नावली, आदि ग्रन्थों में पायी जाती है। **सुचरितफले—**शोभनं चरितं सुचरितम् "कुगतिप्रादयः" से समास हुआ है। **स्वल्पीभूतम्—**अस्वल्पं स्वल्पं सम्पद्यते यथा तथाभूतम्। इस विग्रह में "स्वल्प" शब्द से अभूततद्भाव अर्थ में "च्वि" प्रत्यय एवं "भू" धातु से, "क्त" प्रत्यय लाकर स्वल्पीभूत शब्द की निष्पत्ति होती है। **स्वर्गिणाम्—**स्वर्गमस्त्यस्य इति स्वर्गी। स्वर्ग से "अतः इनठनौ" से इन् प्रत्यय लाकर "स्वर्गी" यह रूप बनता है। तेषां स्वर्गिणाम्।
**अलंकारः—**यहाँ "विशालाम्" में "दिवः खण्डमिव" इस वाक्य के द्वारा स्वर्ग के एक खण्ड की सम्भावना की गयी है अतः "उत्प्रेक्षा" अलंकार हुआ, एवं "श्रीविशालां विशालाम्" यहाँ "यमक" अलंकार हुआ इसलिए दोनों का "संसृष्टि" अलंकार है ॥ ३० ॥
दीर्घीकुर्वन् पटु मदकलं कूजितं सारसानां
प्रत्यूषेषु स्फुटितकमलामोदमैत्रीकषायः ।
यत्र स्त्रीणां हरति सुरतग्लानिमङ्गानुकूलः
शिप्रावातः प्रियतम इव प्रार्थना चाटुकारः ॥ ३१ ॥