मेघदूतम् (वैद्यनाथ झा शास्त्री हिन्दी टीका सहित)
Meghadutam of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Meghadutam with Sanskrit text and Hindi Commentary by Pt. Vaidyanath Jha Shastri (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ | मेघदूतम्
देवयोनिविशेष," जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु = सीता जी के स्नान करने के कारण पवित्र हो गया है जल जहाँ का, स्निग्धच्छायातरुषु = घने छाया वाले वृक्ष हैं जहाँ पर, ( ऐसे ) रामगिर्याश्रमेषु = रामगिरि नामक पर्वत के आश्रमों में ' वसति = अपना निवास, चक्रे = बनाया।
**भावार्थ:—**स्वकर्तव्ये असावधानः कश्चिदज्ञातनामधेयो यक्षः, स्वामिनः कुबेरस्य प्रियावियोगरूपैकवर्षभोग्यात् शापात्, (तमभिशप्तसमयमतिवाहयितुम्) गहनच्छायायुक्तवृक्षेषु "रामगिरि" पर्वतकुटीरेषु स्वनिवासं कृतवान् ।
**हिन्दी—**अपने कर्तव्य में असावधानी करने वाले, ( अत एव ) अपनी प्रियतमा के वियोग के कारण दुःसह एवं एक वर्ष तक भोगे जाने वाले स्वामी कुबेर के शाप से असमर्थ महिमावाले, किसी यक्ष ने, "रामगिरि" नामक पर्वत के आश्रमों में अपना निवासस्थान बनाया ।
**समास:—**कान्ताविरहगुरुणा = कान्तायाः विरहः कान्ताविरहः ( ष० तत् ० ) कान्ताविरहेण गुरुः ( तृ० तत् ० ) कान्ताविरहगुरुस्तेन कान्ताविरहगुरुणा । स्वाधिकारात् = स्वस्य अधिकारः स्वाधिकारः ( ष० तत् ०) अथवा स्वः अधिकारः = स्वाधिकारः ( कर्मधारय ) । अस्तंगमितमहिमा = अस्तंगमितो महिमा यस्य ( बहुव्रीहि ) स अस्तंगमितमहिमा । वर्षभोग्येण = वर्षं भोग्यः वर्षभोग्यः, यहाँ पर वर्ष के आगे जो द्वितीया विभक्ति है वह "कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे च" इस सूत्र से विहित है; पश्चात् "अत्यन्तसंयोगे च" इस सूत्र से समास किया गया है । जनकतनयायाः स्नानं = जनकतनयास्नानम् ( ष० तत् ० ) जनकतनयास्नानैः पुण्यानि उदकानि येषु ( बहुव्री० ) जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु । स्निग्धच्छायातरुषु = स्निग्धा च सा छाया स्निग्धच्छाया (कर्मधारय), यहाँ पर "पुंवत्कर्मधारयजातीयदेशीयेषु" इस सूत्र से "स्निग्धा" इस स्त्रीवाचक शब्दको पुंवद्भाव होकर स्निग्ध ऐसा रूप बना; पश्चात् तुगादि करके स्निग्धच्छाया ऐसा प्रयोग बनाया जाता है । स्निग्धच्छाया प्रधानास्तरवो येषु स्निग्धच्छायातरुषु,यहाँ पर "शाकपार्थिवादीनां सिद्धय उत्तरपदलोपश्च" इस वार्तिक से "प्रधान" इस मध्यम पद का लोप कर समास किया गया है ।