भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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१८ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः १२७ कल्पना करने वाले व्यक्ति को जो पाप होता है वह अश्वमेध विषयक ज्ञान से निवृत्त होता है एवं ब्रह्महत्या का अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति के पाप का यज्ञ के अनुष्ठान से ही मुक्ति होती है । समान फल का निर्देश रहने पर भी प्रकार में भेद रहता है । यह केवल युक्ति के आधार पर नहीं है, वरन् चातुर्मास्य सोम प्रकरण में जो अर्थवाद कहा गया है, उससे भी यही अर्थ सिद्ध होता है । "यदग्निहोत्रं जुहोत्यथ दश गृहमेधिनं आप्नोत्येकया रात्रिया" इत्यादि क्रम में गृहमेधी अग्निहोत्रं दर्शपूर्णमास आदि एक-एक याग के समान है, अतः स्वल्पायास अथवा बहु आयास साध्य अनेक कर्मों का एक प्रकार के फल का श्रवण रहने पर भी असामञ्जस्य का अवकाश नहीं है । फलस्य = फल का, कर्मनिष्पत्तेः = कर्म के द्वारा निष्पत्ति होने से, तेषां = कर्म- फलों का, परिणामतः = परिमाण के अनुसार, फल विशेषः = फल का अल्पता या आधिक्य, स्यात् = होता है । लोकवत् = लौकिक दृष्टान्त के अनुसार लोक व्यवहार में । जैसे भूमि का स्वल्पकर्षण एवं अधिक कर्षणरूप परिमाण के अनुसार कृषि आदि फल की अल्पता एवं अधिकता रहती है, वैदिक धर्म का भी परिमाण के अनुसार फल का तारतम्य होता है, क्योंकि कर्म के द्वारा ही फल की निष्पत्ति होती है ॥ १७ ॥ अन्त्ययोर्यथोक्तम् ॥ १.२.१८ ॥ शा० भा०—अभागिप्रतिषेधादित्यादावुदाहृतं—न पृथिव्यामग्निश्चेतव्यो नान्तरिक्षे न दिवीति, हिरण्यं निधाय चेतव्यमित्याकाङ्क्षितत्वादस्य विधेः शेषः । पृथिव्यादीनां निन्दा हिरण्यस्तुत्यर्था । असति प्रसङ्गे प्रतिषेधो नित्या- नुवादः । यच्चानित्यदर्शनं 'बबरः प्रावाहणिरकामयत' इति । तत्परिहृतम् । अर्थवादाक्षेपेण पुनरुत्थितमिदानीमर्थवादप्रामाण्ये तेनैव परिहारेण परिहरिष्यत इति ॥ १८ ॥ भा० वि०—एवं पूर्णाहूतिवाक्यस्य स्वार्थासत्यत्वादिनार्थक्यप्रसङ्गं परिहृत्य, अधुना न पृथिव्यामित्यादौ नाभागिप्रतिषेधप्रसङ्गः नापि बबरः प्रावाहणिरित्यादावनित्यसंयोगप्रसङ्ग इत्याह - अन्त्ययोरिति । अभागिप्रतिषेध- निरासार्थं सूत्रं योजयति—अभागीति । निन्दायाः कथं विधिशेषत्वमित्याशङ्क्य यथोक्तमितिपदं व्याकुर्वन् स्तेयानृतवादार्थवादन्यायमतिदिशति—पृथिव्यादीति । ननु शुद्धपृथिवीचयननिषेधस्य हिरण्यनिधानस्तुत्यर्थत्वेऽपि नान्तरिक्ष इत्यादेः कथं तच्छेषत्वं तत्राह—असतीति । असत्यामपि प्राप्तौ प्रतिषेधो नित्यानुवादो दृष्टान्तार्थः; यथान्तरिक्षे, दिवि वा चयनमनुमतम् । एवं शुद्धायामपि पृथिव्यामित्यर्थः ।