मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 30, कुल 804 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश महापुराण की रचना की है, किन्तु, साधारण सुधीगण के दो सुसङ्गत अर्थ विशिष्ट पद्यों की रचना भी कठिन है - 'मुने पुराणानि दशाष्ट साक्षात् श्रुत्यर्थगर्भाणि सुदुष्कराणि । कृतानि पद्यद्वयमत्र कर्तुं को नाम शक्नोति सुसङ्गतार्थम् ॥' (शङ्करदिग्विजय । २४) जिसका समर्थन आचार्य शङ्कर ने देवताधिकरण में 'तस्मात् समूलम् इतिहासपुराणम्' यह कहते हुए किया तथा आचार्य सायण ने भी भाष्योपक्रमणिका में आपात दृष्टि से विरुद्ध रूप में परिलक्षित विषय का मीमांसा शास्त्रोक्त पद्धति के अनुसार प्रामाण्य स्थापित किया है। अतः - यह मानना ही होगा कि विज्ञानदृप्त-सत्यता-शिखरिणी-समारूढ़-समाज के लिए वर्तमान युग में यह उपकारक है। अग्निकुण्ड एवं यज्ञमण्डप आदि की निर्माण- प्रक्रिया ही आज के गृह निर्माण एवं चित्रकला आदि का मूलाधार है। दक्षिण और बङ्गाल में आज नारियाँ इसी परम्परा से दक्ष प्रातः गृहद्वार पर अनायास श्रुति सम्मत चित्र का निर्माण कर कल्याण की कामना करती हुई अनायास ही चित्रकला की प्राथमिक शिक्षा देती हैं। मीमांसा हजारों अधिकरण के सहस्रधा विचार करने पर हजारों न्याय स्थापित होते हैं, उसी के समान भौतिक वाक्यों का यथार्थ ज्ञान सम्भव होता है। यदि आधुनिक न्यायाधीश इस न्याय की पद्धति से न्याय निर्णय की दिशा प्रशस्त करें तो निश्चित ही निर्णय में विपर्यय की सम्भावना नहीं होगी । मीमांसादर्शन के सूत्रों के आधार पर दर्शनशास्त्र के आलोच्य सृष्टितत्त्व, आत्म- तत्त्व एवं ईश्वरतत्त्व आदि के विषय में स्पष्टतः निर्देश नहीं है, किन्तु वट-बीज के समान अवस्थित इन तत्त्वों का उद्घाटन परवर्ती आचार्यों ने किया है—संसार अनादि होने से सृष्टि और प्रलय नहीं है। आत्मा वेद विहित कर्म का कर्त्ता एवं उसका फल भोक्ता होने से व्यावहारिक जीव ही आत्मा है अर्थात् शरीरातिरिक्त अहङ्कार ही आत्मा है और वह जन्म, मरण, स्वर्ग और नरक आदि के साथ सम्बन्धयुक्त है। चिरविनष्ट फल की उपपत्ति के लिए अपूर्व नामक पदार्थ माना है, ईश्वर फलप्रद नहीं है। अपौरुषेय वेद का स्वतः प्रामाण्य है। इसीलिए शङ्कर-दिग्विजय ने कहा है—'निरास्यमीशं श्रुतिलोकसिद्धं श्रुतेः स्वतो मातृत्वमुदाहरिष्यन्' (६।८९) मीमांसा-सिद्धान्त में अतीन्द्रिय सुख नहीं है, वेद क्रिया का प्रतिपादक है। भाट्टमत में विपरीत ख्याति और प्रभाकरमत में अख्याति ही भ्रम में भासमान होती है। प्रभाकरमत में क्रियान्वित शब्द में शक्ति है एवं अन्विताभिधानवाद माना गया है। भाट्टमत में सिद्धवस्तु में शक्ति है एवं अभिहितान्वयवाद है। याग, दान होमादि वैध कर्म है एवं ब्रह्महत्या, कलञ्जभक्षण आदि निषिद्ध कर्म है। मीमांसा के सिद्धान्त में शास्त्रोक्त चतुर्थी विभक्तियुक्त शब्द से त्यज्यमान द्रव्य का उद्देशीभूत ही देवता है। तात्त्विक दृष्टि से जिस नाम से जिस शब्द में जिस भाव में जो भी देवता शास्त्र उद्देशीभूत हो किन्तु वैदिक दृष्टि से जैसा पूर्व