भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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१ . ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः १५७ भावप्रकाश भा० प्र०—प्रथम पाद में वेदविधि का प्रामाण्य निरूपित किया गया है और द्वितीय पाद में अर्थवाद और मन्त्र का प्रामाण्य सिद्ध किया गया है । तृतीय पाद में अन्य शाखाओं में स्थित वेदविधि, मन्त्र या अर्थवादमूलक स्मृति के प्रामाण्य का विचार किया जा रहा है । स्मृति प्रमाण है या अप्रमाण इस प्रकार का संशय होने पर 'धर्मस्य शब्दमूलत्वाद- शब्दमनपेक्षं स्यात्' १।३।१ इस सूत्र की पूर्वपक्ष के रूप में अवतारणा की गई है । पूर्वपक्ष के समर्थन में यहाँ कहा गया है कि 'अष्टकाः कर्तव्याः' अर्थात् अष्टका श्राद्ध करना चाहिये, 'तडागं खनितव्यम्' तालाब खन कर प्रतिष्ठा करनी चाहिये, 'प्रपा प्रवर्त्तयितव्या' जल सत्र को प्रवर्तित करना कर्तव्य है, 'शिखाकर्म कर्तव्यम्' शिखा धारण करना चाहिये इत्यादि शिष्टजनों से परिगृहीत स्मृति वचन हैं, किन्तु वे धर्म में प्रमाण नहीं हैं, अर्थात् ये कर्म धर्म नहीं हैं। क्योंकि धर्म का लक्षण निरूपण करते हुए कहा गया है कि धर्म चोदनालक्षण अर्थात् वेदविधि से बोध्य ही है, किन्तु इन स्मृति वचनों के मूल में कोई वैदिक वचन नहीं है । यदि यह कहा जाय स्मरण अर्थ वेद के अर्थ का स्मरण मात्र है और स्मरण की उत्पत्ति अनुभव के बिना नहीं हो सकती है, अतः, अर्थापत्ति के आधार पर उसका पूर्व में अनुभव अवश्य ही मानना होगा; धर्म यह अलौकिक अदृष्ट तत्त्व है, अतः, इसमें प्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष को उपजीवक मान कर स्थिर अनुमान एवं उपमान प्रमाण का प्रामाण्य नहीं हो सकता है। अपितु शाब्द ज्ञान रूप अनुभव के फलस्वरूप ही धर्म का स्मरण किया जा सकता है । किन्तु इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि वन्ध्या नारी यह कहे कि 'यह मेरे दौहित्र का मकान है, तो यह वचन बाधित मानना पड़ेगा, क्योंकि कन्या की उत्पत्ति के बाद उस कन्या का पुत्र दौहित्र होगा, और दौहित्र होने पर उसके भवन का ज्ञान होगा, कन्या के स्मरण के बिना दौहित्र का स्मरण नहीं हो सकता है। प्रकृत में भी श्रुति के वचनों के अनुभव के बाद ही उसके अर्थ का स्मरण होगा, अर्थात् स्मृति का मूलीभूत शाब्दज्ञान, इस शाब्दज्ञान का कारण स्वरूप शब्द . अर्थात् श्रुतिवचन है, श्रुति वचन के स्मरण के बिना श्रुति वचन सहित अर्थ का स्मरण नहीं हो सकता है। वेद अविच्छिन्न परम्परा के क्रम में आ रहा है, अर्थात् अपौरुषेय रूप में परम्परा से प्राप्त है, अतः, प्रमाण है, इसी तरह स्मृति भी परम्परा क्रम में आ रही है, अतः प्रमाण है। किन्तु, इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि वेद मात्र परम्परा क्रम में प्राप्त होने से प्रमाण नहीं है, अपितु, किसी पुरुष विशेष से रचित न होने के कारण ही—यह प्रमाण है, किन्तु स्मृतियाँ तो मनु आदि मनुष्यों के द्वारा रचित हैं, अतः, भ्रम प्रमाद आदि दोष से युक्त मानव की रचना स्वतः प्रमाण नहीं है, धर्म अलौकिक है, अदृष्ट है, उसका साक्षात्कार मनुष्य नहीं कर सकता है, इसलिए साक्षात्कारपूर्वक उस विषय का प्रतिपादन १७