मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३० मीमांसादर्शनम् [ सू० तो आर्य और म्लेच्छ दोनों के प्रयोगों से ही इस प्रयोजन की सिद्धि होती, और ऐसी स्थिति में बलाबल अनवधारित रहता । किन्तु धर्म का ज्ञान शब्द का प्रयोजन है, और शब्द से ही धर्मतत्त्व की अवगति हो जाती है, तत्र शब्द और अर्थ का अल्पविप्लव भी धर्म का प्रतिद्वन्द्वी होगा, अतः आर्यों ने अतिशय सावधानी से निगम निरुक्त आदि के साहाय्यसे यथायथ अर्थ का स्मरण कर निर्णय करते हैं । म्लेच्छों के द्वारा प्रदर्शित अर्थ में वैपरीत्य रहने पर उसके परिहार का कोई साधन न होने से उनके अर्थ में विपर्यय स्वाभाविक है । इसलिए म्लेच्छों से व्यवहृत विपरीत अर्थ की स्मृति की अपेक्षा आर्यों का विप्लव शून्य अर्थ स्मरण ही बलवान् है । एक ही शब्द का अनेक अर्थ मानने पर विकल्प का प्रसङ्ग होगा । विकल्प मानने पर आठ दोषों की स्थिति होती है, अतः यह मानना उचित नहीं है । एक ही शब्द का विभिन्न अर्थ होने पर प्रत्येक अर्थ के प्रति शब्द की वाचकता शक्ति की कल्पना करनी पड़ेगी, इसलिए एक शब्द का अनेक अर्थ मानना उचित नहीं है । हरि शब्द का अनेक अर्थ माना गया है, किन्तु वहाँ तो अन्य उपाय न होने के कारण हरि शब्द को अनेकार्थक मानना पड़ता है, इसलिए यव, पीलु शब्द का अर्थ दीर्घशूक वृक्षविशेष ही समझना चाहिए । वार्तिककार ने इस प्रसङ्ग में भिन्न रूप में अधिकरण की रचना कर स्मृति और आचार के विरोध में बलाबल का निरूपण किया है । देश भेद से अनेक आचार और स्मृति विरुद्ध मिलते हैं । फिर भी स्मृति और आचार को समान बल मानकर विकल्प होगा या स्मृति के द्वारा आचार का बाध होगा ? इस प्रकार संशय का उत्थापन कर सिद्धान्त में कहा है कि आचार के द्वारा स्मृति का अनुमान एवं स्मृति के द्वारा श्रुति का अनुमान होगा । क्योंकि, स्मृति के समान आचार स्वयं विधायक नहीं है । अतः, श्रुति के साथ आचार का दूर का सम्बन्ध है और स्मृति का श्रुति के साथ सन्निकृष्ट सम्बन्ध स्थित है । इसलिए आचार जितने काल की अपेक्षा कर स्मृति के द्वारा श्रुति की कल्पना कर विधायक होगा, स्मृति उससे कम ही समय में श्रुति की कल्पना कर स्मृति का प्रामाण्य प्रतिष्ठित करेगी । अतः स्मृति और आचार का प्रामाण्य तुल्यबल नहीं है । आचार के प्रामाण्य में स्मृति और श्रुति दो का अन्तर है, और स्मृति के प्रामाण्य में केवल एक श्रुति का ही अन्तर है, अतः दोनों में विकल्प की सम्भावना नहीं है, वरन् स्मृति से आचार का बाध ही होगा, अतः दक्षिण में मातुल (मामा) की कन्या के साथ पाणिग्रहण आदि आचार "मातुलस्य सुतामूढ्वा.......त्यक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्" इस स्मृति के विरुद्ध होने से अनादरणीय है । इसी प्रकार पर्युषितान्न भोजन, पति- पत्नी का सहभोजन आदि आचार स्मृति विरुद्ध होने से अप्रमाण है । इस प्रसङ्ग में न्यायसुधा भाट्टदीपिका भाट्टचिन्तामणि में विस्तृत विचार पूर्वक मातुलकन्या के साथ विवाह का प्रामाण्य स्थापित किया गया है ।