भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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२६ ] प्रथमाध्याये तृतीयपादः ५८३ एकेति । गोशब्दोच्चिचारयिषायामशक्त्या केनचिद्गावीत्युच्चारिते, श्रुतगावीशब्दसादृश्यं गोशब्दस्योपमानेनावगम्य, गावीशब्दोच्चारणस्य गोशब्दोच्चिचारयिषामूलत्वानुमानाद् गोशब्दशक्त्यनुसारेण गावीशब्दादप्यर्थप्रत्ययोपपत्तेर्न गावीशब्दस्य शक्त्यन्तरकल्पन- मित्यर्थः । अनेकशब्दत्वस्यान्याय्यत्वं पञ्चधोपपादितमुपसंहरति - तस्मादिति । स्वरूपं नियमरूपतासम्बन्धः सामर्थ्यलक्षणः शब्दो नामार्थो नामान्तरेऽप्यभिन्न इत्येषां चतुष्टयोपसंहारः । निरूपणशब्दव्यवस्थार्थत्वेनावश्यं विकल्पप्रसङ्गलक्षणोपपत्त्युपसंहारः । सर्वशब्दमध्ये एकैकस्यैव गवाश्वादिशब्दस्य वाचकत्वनियमादिति वीप्सार्थः । यद्वैकस्यैव शब्दस्य वाचकत्वनियमादेकस्यैव चार्थस्य वाच्यत्वनियमादिति यववराहाधिकरणोक्तो वाच्यैकत्वनियमो दृष्टान्तत्वेन वीप्सयोक्तः । कथं पुनरुपमानानुमानाभ्यामेकशक्त्यनुसारेण गतिसम्भव इत्याशङ्क्याह - यथा चेति । सिद्धान्तमुपसंहरति - तेनेति ॥ २६ ॥ भा० प्र०—इस प्रसङ्ग में यह शङ्का हो सकती है कि एक शब्द को साधु और अन्य शब्द को असाधु मानने का क्या कारण है ? सभी अपरपर्याय शब्दों में एक ही अर्थ के सभी शब्द वाचक होते हैं । अनेक शब्द को एक अर्थ का वाचक मानना उचित नहीं है । एक ही अर्थ की अनेक शब्दों से प्रतीति माननी होगी, किन्तु ऐसा मानने पर शब्द का अप्रामाण्य मानना होगा । अव्युत्पन्न व्यक्ति जब शब्द और अर्थ के सम्बन्ध का ज्ञान करता है, तब यह निर्णय करता है कि यह गो शब्द का वाच्य है; यह अश्व शब्द का वाच्य नहीं है इत्यादि नियम पूर्वक ही व्युत्पत्ति होती है । किन्तु इसके बाद जो यह समझता है कि गोणी गोता आदि सभी शब्दों का वाच्य गौ ही है । तब पूर्व नियम का वाध होता है । पूर्वोक्त नियम का बाध होने पर अव्युत्पन्न व्यक्ति को शब्द से अर्थ का बोध नहीं होगा । 'गामानय' गौ को लाओ इस प्रकार गो शब्द के सुनने के बाद कोई व्यक्ति जब गलकम्बल आदि से विशिष्ट प्राणिविशेष विशेषरूप को लेकर व्यवहार करता है । ऐसी स्थिति में अन्य अव्युत्पन्न व्यक्ति अर्थापत्ति प्रमाण के द्वारा यह अवगत करता है कि गो शब्द में गलकम्बलादि विशिष्ट प्राणिविशेषरूप अर्थ को बोध कराने की शक्ति है । इस प्रकार एक शब्द के सामर्थ्य से एक अर्थ सिद्ध होता है, उसी प्रकार अनेक शक्ति की कल्पना नहीं की जाती है, क्योंकि इसमें अर्थापत्ति बाधित होता है । अनेक शब्दों को एक अर्थ का वाचक मानने पर विकल्प की प्रसक्ति होगी । विकल्प मानने पर सभी के प्रामाण्य को पक्ष में बाधित मानना होगा । अतः सम्भव पक्ष में अन्यथा उपपत्ति होने पर विकल्प मानना उचित नहीं है । कर, हस्त आदि प्रयोगों में एक अर्थ में अनेक शब्द की वाच्यता माननी ही होगी ; क्योंकि दूसरा उपाय नहीं है । इसलिए गो, गावी आदि शब्दों में एक शब्द साधु है और अन्य शब्द असाधु हैं, अपभ्रंश है, वक्ता के उच्चारण के असामर्थ्य के कारण ही ये शब्द प्रयुक्त हुए हैं । हस्त, कर, पाणि आदि शब्दों का एक अर्थ में प्रयोग शिष्टाचार के कारण अनादि सम्बन्ध है । वस्तुतः एकार्थक मानने पर भी व्युत्पत्ति के आधार पर इन शब्दों के द्वारा