भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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१८ मीमांसादर्शनम् [ सू० स्थिति है तो यह भी स्वतः प्रमाण१ नहीं होगा। इस प्रकार वेदान्त का अनपेक्षत्व लक्षण प्रामाण्य सङ्गत नहीं है। वेदान्त का अप्रामाण्य या अप्रयोजनीयता उचित नहीं है। 'वेदाध्ययन करना चाहिए' इस विधि के द्वारा समग्र वेद की प्रयोजनवत्ता सिद्ध है। अतः, वेदान्त को ब्रह्म बोधक न मानकर वेदविहित अग्निहोत्रादि रूप कर्म के लिए अपेक्षित कर्ता, देवता आदि वस्तुओं का प्रतिपादक मानना ही उचित है। यदि कर्मबोधक वेदांश के सान्निध्य का अभाव वेदान्त (उपनिषद्) में होने से कर्मपरक मानना उचित न हो तो उपासनादिरूप क्रियापरक मानने में क्या आपत्ति है? ऐसा मानने पर प्रत्यक्षादि प्रमाण से अनधिगतविषयक होने से अनपेक्षत्वरूप प्रामाण्य और सप्रयोजनत्व भी सिद्ध होता है। आचार्य के इसी अभिप्राय से आचार्य शङ्कर ने इस सूत्र का पूर्वपक्ष के रूप में उपस्थापन किया है। इस सूत्र में भामतीकार ने आनर्थक्य का अर्थ अप्रयोजनवत्त्व माना है और यह अप्रयोजनवत्त्व अनुवादक मानने पर ही सम्भव है। आपात दृष्टि से आनर्थक्य का अर्थ अभिधेयरहितत्व ही होता है अर्थात् किसी प्रकार अर्थ न होना एवं निष्प्रयोजनत्व। उपनिषद् का श्रवणकर किसी व्युत्पन्न व्यक्ति को अर्थ का बोध होगा ही तब उपनिषद् का कोई अर्थ नहीं है—यह कथन सङ्गत नहीं है। यही कारण है कि आनर्थक्य का अर्थ निष्प्रयोजनवत्त्व अर्थ किया है। फलतः, ब्रह्म शास्त्रप्रमाण- गम्य नहीं है—यही पूर्वपक्ष के रूप में आचार्य शङ्कर ने किया है। किन्तु, परमर्षि जैमिनि के द्वारा प्रदर्शित सिद्धान्त पक्ष के साथ आचार्य शङ्कर का ऐकमत्य नहीं है। अतः, इस विरोध का विश्लेषण "विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः।" (जै० सू० १।२।६) इस सूत्र के विश्लेषण प्रसङ्ग में करूँगा ॥ १ ॥ शास्त्रदृष्टविरोधाच्च ॥ १.२.२ ॥ शा०—'स्तेनं मनः' 'अनृतवादिनी वाक्' इत्येवं जातीयकानां धर्मं प्रत्यप्रामाण्यम्, भूतानुवादात्। विपरिणामादिभिरपि कल्प्यमाने स्तेयं मृषोक्तं च कर्तव्यमित्यापतत्ति । तच्चाशक्यं स्तेयानृतवादप्रतिषेधमबाधमानेनानुष्ठातुम्। न च विकल्पः, वैषम्यात्। एकः कल्प्यो विधिः, एकः प्रत्यक्षः। अथ दृष्टविरोधः। 'तस्माद् धूम एवाग्नेर्दिवा ददृशे, नार्चिः। तस्मादर्चि- रेवाग्नेर्नक्तं ददृशे न धूमः' तस्माद् दृष्टविरुद्धं इति। 'अस्माल्लोकादुत्क्रम्याग्नि- १. प्रमाणसम्वादवाद या प्रमाणसंप्लववाद एवं प्रमाणासंप्लववाद या प्रमाणविसम्वाद- वाद। प्रथम मत में एक वस्तु में एक से अधिक प्रमाण रहने पर भी कोई भी अनुवादक या अनुवादकत्व निबन्धन अप्रमाण नहीं होता है। द्वितीय मत में एक से अधिक प्रमाण रहने पर जिस प्रमाण से जो प्रथम अवगत होता है वह प्रमाण ओर बाद में जिस प्रमाण से अवगत होता है उसमें अनुवादकत्व निबन्धन प्रमाण नहीं रहता है।