भारतकोश
मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)

Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya

महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा

स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished804 पृष्ठ

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१ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः २९ वचनमनर्थकं स्यादित्यत आह—तस्मादिति । न तु सत्यपि प्रत्यक्षविरोधे विकल्पेन प्रामाण्योपपत्तेः प्रत्यक्षविरुद्धवचनमप्रमाणमिति भाष्यमयुक्तमित्याशङ्कयाह—पूर्ववच्चेति । विकल्पविषय एवायं न भवतीत्याह—अपि चेति । को हि तद्वेदेति शास्त्रदृष्टविरो धोदाहरणे भाष्यकारेण पूर्वं तावदाद्यं सूत्रं योजितम् यदि प्रश्न इति । तद्व्याचष्टे—पूर्ववदेवेति । शास्त्रदृष्टविरोधप्रतिपादनार्थं यद्यनवक्लृप्ति- रित्यादिभाष्यम्, तद्व्याचष्टे—निश्चितेति ॥ २ ॥ अर्थवाद वाक्यों के अप्रामाण्य में अन्य साधनों का प्रदर्शन करते हुए परमर्षि जैमिनि ने कहा है—शास्त्र से अवगत अर्थों के साथ विरोध है । अतः अर्थवाद वाक्य अप्रमाण है, कुछ अर्थवाद वाक्य प्रत्यक्ष विरुद्ध है और कतिपय अर्थवाद वाक्य शास्त्रदृष्ट विरुद्ध होते हैं अर्थात् प्रत्यक्ष एवं शास्त्रवचनों के द्वारा अवगत विषयों के विरुद्ध हैं । फलतः, शास्त्र- विरोध, दृष्ट-विरोध एवं शास्त्रदृष्टविरोध —इन तीन प्रकार के विरोधों के कारण अर्थवाद वाक्य अप्रमाण हैं । "स्तेनं मनः" "अनृतवादिनी वाक्" इत्यादि अर्थवाद वाक्यों में अध्याहार कर विधि की कल्पना की जाय तो यही अर्थ मानना होगा कि मन चोर है अतः स्तेय अर्थात् चौर्य कर्म करना चाहिए, वाणी अनृतवादिनी है, अतः अनृतभाषण कर्तव्य है—इसी रूप में "यतः स्तेयं मनः अतः स्तेनं कर्तव्यम्", "यतः अनृतवादिनी वाक् अतः अनृतभाषणं कर्तव्यम्", किन्तु, चोरी करना एवं झूठ बोलना उचित नहीं है । इसी प्रकार "तस्माद् धूम एवाग्नेर्दिवा ददृशे नार्चिस्तस्मादर्चिरेवाग्नेर्नक्तं ददृशे न धूमः", (तै० ब्रा० २।९।२) क्योंकि दिन में अग्नि का धूम ही दिखाई देता है, किन्तु 'अर्चिचः' अग्नि शिखा नहीं दिखाई देती है एवं रात्रि में अग्नि की शिखा ही दिखाई देती है, किन्तु, धूम नहीं दिखाई देता है । "नचैतद् विद्मो वयं ब्राह्मणाः स्मोऽब्राह्मणा वा" (मैत्रायणी संहिता १।४।११) हम लोग ब्राह्मण हैं या अब्राह्मण है; यह नहीं जानते है, इत्यादि अर्थवाद प्रत्यक्ष विरुद्ध हैं । इसी प्रकार "को हि तद् वेद यद्यमुष्मिन् लोकेऽस्ति वा न वा" (तै० सं० ६।२।२) परलोक में कुछ है या नहीं, इसको कौन जानता है, यह शास्त्रदृष्ट विरुद्ध है, कारण, "स्वर्गकामो यजेत" इत्यादि शास्त्रों से पारलौकिक फल का विषय अवगत होता है ॥ २ ॥ तथा फलाभावात् ॥ १.२.३ ॥ शा०—गर्गत्रिरात्रब्राह्मणं प्रकृत्योच्यते, शोभतेऽस्य मुखं य एवं वेद, (ता० ब्रा० २०। १६।६ तै ब्रा० ३।८।१०) इति । यदि भूतानुवादः, अनर्थकः । अथाऽध्ययनफलानुवादः । ततोऽसदनुवादः कालान्तरे फलं भविष्यतीति चेत् ? न ह्यत्र प्रमाणमस्ति । विधिः स्यादिति चेत् ? नैष विधिपरः 'द्रव्यसंस्कारकर्मसु' परार्थत्वात् फलश्रुतिरर्थवादः स्यात् (जै० सू० ४।३।१) इति चिन्तयिष्यत्येतदुपरिष्टात् किं फलविधिः, उतार्थवाद इति । इह तु किं भूतानुवादः